Wednesday, June 21, 2017

आसाम मेघालय यात्रा: दूसरा दिन हनुमानगढी दर्शन अयोध्या ।।

अयोध्या न जाने कितनी बार बसी और उजड़ी, फिर भी एक स्थान हमेशा अपने मूल रूप में ही रहा। यही वह हनुमान टीला है, जो आज हनुमानगढ़ी के नाम से प्रसिद्ध है। इस्लाम के अनुयायी शाषक बुतपरस्ती की खिलाफत के चलते मूर्तिकला के इतने बडे दुश्मन हो जायेंगे कि बौद्ध जैन हिंदू किसी भी मंदिर को न छोडेंगे, शायद मुहम्मद साहब को भी पता न होगा। हालांकि अयोध्या ने दोनों ही तरह के मुस्लिम शाषक देखे हैं। एक तरफ मंदिरों को ध्वस्त करते मूर्तियों को खंडित करते आतताई देखे हैं तो भगवनकृपा से अभिभूत दान देते श्रद्धालु मुसलमान भी देखे हैं।
आमिर अली नाम के एक शाषक के हनुमान गढी पर आक्रमण को रोकने बाले सशस्त्र नागा बाबाओं की कहानियां अयोध्या में खूब प्रचलित हैं तो वहीं दूसरी ओर मंसूर अली जैसे दानी नबाव भी लोकप्रिय है। किवदंती के अनुसार लगभग दसवीं शताब्दी के मध्य में सुल्तान मंसूर अली लखनऊ और फैजाबाद का प्रशासक था। एक बार सुल्तान मंसूर अली का एकमात्र पुत्र बीमार पड़ गया। प्राण बचने के आसार नहीं रहे, रात्रि की कालिमा गहराने के साथ ही उसकी नाडी उखडने लगी तो सुल्तान ने थक हार कर हनुमानजी की शरण ली। अपने इकलौते पुत्र के प्राणों की रक्षा होने पर अवध के नवाब मंसूर अली ने बजरंगबली के चरणों में माथा टेक दिया। जिसके बाद नवाब ने न केवल हनुमान गढ़ी मंदिर का जीर्णोंद्धार कराया बल्कि तांम्रपत्र पर लिखकर ये घोषणा की कि कभी भी इस मंदिर पर किसी राजा या शासक का कोई अधिकार नहीं रहेगा और न ही यहां के चढ़ावे से कोई कर वसूल किया जाएगा, और 52 बीघा भूमि हनुमान गढी व इमली वन के लिए उपलब्ध करवाई थी।
अयोध्या के सशस्त्र निर्वाणी अणी (सेना) के महन्त अभय रामदास के नेतृत्व में 18वीं शताब्दी में नागा साधुओं ने हनुमान गढ़ी को मुसलमानों से मुक्त कराया । वे सिद्धयोगी भी थे। उनके मार्गदर्शन में सशस्त्र नागा साधु बड़ी संख्या में विचरणशील थे। उनकी इस सशस्त्र नागा अणी (सेना) में देशभर के नागा साधु-संत बड़ी संख्या में सम्मिलित थे।
एक दिन महन्त अभय रामदास जब प्रवास में उज्जयिनी से चलकर अयोध्या आए, तो उन्होंने अपनी सशस्त्र नागा अणी (सेना) का पड़ाव सरयू नदी के तट पर डाला। वहां उन्हें पता चला कि अयोध्या में त्रेतायुगीन श्रीराम राज्य के समय भगवान श्री राम के राजमहल (रामकोट) के पूर्वी द्वार पर स्थित हनुमान जी के वासस्थान पर मुसलमानों ने कब्जा करके वहां नमाज पढ़नी शुरू कर दी है। हनुमान जी का वह आवास मात्र एक “टीले” के रूप में रह गया है, जिसे लोग “हनुमान टीला” कहने लगे हैं। यह दृश्य महन्त अभय रामदास को कचोटने लगा। एक दिन वे अपनी सशस्त्र नागा अणी (सेना) लेकर हनुमान टीले पर चढ़ आए और वहां से मुसलमानों को भगा दिया। महन्त अभय रामदास नियमपूर्वक प्रत्येक आश्विन शुक्ल अष्टमी को अपनी अणी (सेना) सहित शस्त्र-पूजन किया करते थे। उनकी तलवार तब हवन कुण्ड के समीप ही रखी होती थी। बाद में मुसलमानों ने कई बार हनुमान गढ़ी पर धावा बोला, पर महन्त अभय रामदास ने हर बार उन्हें मार भगाया। महन्त अभय रामदास तब से स्थायी रूप से हनुमान गढ़ी में ही निवासकर पूजा अर्चना करने लगे। उनकी सशस्त्र साधु मण्डली भी उनके साथ ही वहीं रहती थी। ये नागा साधु उज्जैन, हरिद्वार, प्रयाग और गंगासागर से संबंधित रहे थे। उनकी 4 श्रेणियां थीं; 1. सागरिया, 2. उज्जैनिया, 3. हरिद्वारी 4. बसंतिया। प्रयाग से संबंधित नागाओं की 3 अणी (सेना) और 7 अखाड़े हैं, जिनमें एक निर्वाणी अणी (सेना) का प्रमुख केन्द्र हनुमान गढ़ी ही रहा है। नागा साधु ही हनुमान गढ़ी के महन्त, पुजारी और उसकी पंचायत के प्रवक्ता होते हैं। नागा पद प्राप्ति के पूर्व साधु को 2-2 साल की 6 श्रेणियों-यात्री, छोटा, हुरदंगा, बंदगीदार आदि नाम वाले स्तरों से गुजरना पड़ता है। बाद में एक बड़े समारोह में उसे नागा पद प्रदान किया जाता है। सन् 1915 में अमीर अली ने हनुमान गढ़ी पर आक्रमण किया था। उसने मुसलमानों को यह कहकर उकसाया कि नागाओं ने मस्जिद ढहा दी है। उसने सुन्नी मुस्लिम फौज बनाकर हनुमान गढ़ी पर चढ़ाई कर दी, पर हनुमान गढ़ी के नागा साधुओं और उनका साथ देने वाले हिन्दू जत्थों ने उन हमलावरों को धूल चाटने पर विवश कर दिया। इस तरह हनुमान गढ़ी सुरक्षित रही। गढ़ी के सर्वोच्च पदाधिकारी को “गद्दीनशीन” कहकर पुकारा जाता है। यह मंदिर काफी बड़ा है। मंदिर के चारों ओर निवास योग्य स्थान बने हैं, जिनमें साधु-संत रहते हैं। हनुमानगढ़ी के दक्षिण में सुग्रीव टीला व अंगद टीला नामक स्थान हैं। आज भी हनुमान गढ़ी के नागा साधु कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी को हनुमत जयन्ती तो मनाते ही हैं, साथ ही कार्तिक शुक्ल एकादशी को सशस्त्र परिक्रमा करते समय उनके हाथ में “निशान” (ध्वज) भी रहता है। इसी प्रकार फाल्गुन शुक्ल एकादशी को भी वे ध्वज के साथ ही शस्त्र-पूजन भी करते हैं। आश्विन शुक्ल को नागा अखाड़ों में शस्त्र-पूजन करके हनुमान गढ़ी से चलकर अयोध्या नगरी में निशान-यात्रा की जाती है।
इस हनुमान टीले तक पहुंचने के लिए भक्तों को पार करना होता है 76 सीढ़ियों का सफर, जिसके बाद दर्शन होते है पवनपुत्र हनुमान की 6 इंच प्रतिमा के, जो हमेशा फूल-मालाओं से सुशोभित रहती है। अंजनीपुत्र की महिमा से परिपूर्ण हनुमान चालीसा की चौपाइयां हृदय के साथ-साथ मंदिर की दीवारों पर सुशोभित हैं। कहते हैं कि हनुमानजी के इस दिव्य स्थान का महत्व किसी धर्म विशेष में बंध कर नहीं रहा, बल्कि जिस किसी ने भी यहां जो भी मुराद मांगी, हनुमानलला ने उसे वही दिया तभी तो अपने इकलौते पुत्र के प्राणों की रक्षा होने पर अवध के नवाब मंसूर अली ने इस मंदिर का जीर्णोंद्धार कराया था।हनुमानगढी मंदिर शिल्पकला की दृष्टि से सुंदर मंदिर है। बाजार में ही है। करीब सत्तर सीढियां चढकर अदंर प्रवेश किया। गेट पर सिर्फ एक गनमैन बैठा हुआ था। रामलला से तो ज्यादा बजरंगवली ताकतवर लगे मुझे जिन्हौने रामलला की तरह Z plus सिक्योरिटी नहीं ले रखी थी। हनुमानगढी एकदम रंग बिरंगा सुंदर मंदिर है जिसके मुख्य भवन के चारों ओर एक वरामदा है और उसके आगे खुला आंगन । आंगन के बाद चारों ओर बने हुये भवन जिसमें अन्य छोटे छोटे कक्ष। मुख्य मंदिर के गेट पर धक्कामुक्की में हम अदंर तो नहीं घुस पाये लेकिन ऊंचे स्थान पर खडे होकर दर्शन आराम से कर लिये। बंदर यहां भी बहुत हैं। ज्यादातर भक्त एक निगाह हनुमान जी पर तो दूसरी निगाह अपने थैले पर रखते हैं। निगाह चूकी नहीं कि थैला गया मंदिर की सबसे ऊंची मंजिल पर।




सत्य की खोज

1 comment:

  1. घुमक्कड़ी के साथ व्याख्यान भी बढ़िया है

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