Thursday, February 2, 2017

सारनाथ : संग्रहालय $ धर्मराजिका स्तूप

बनारस के घाट मंदिर घूमने के एवं लस्सी ठंडाई कचौडी जलेवी का पूरा लुत्फ उठाने के बाद चल दिया सारनाथ की तरफ जहाँ पड़ी बौद्ध धर्म की नींव एवं  महात्मा बुद्ध ने अपना पहला उपदेश दिया था। खाने पीने के मामले में बनारस की ठंडाई , पान और लौंगलत्ता बडी फेमस बतायी थीं। दो चीजों का रसास्वादन तो कर लिया पर भांग की ठंडाई अभी बाकी थी। ठंडाई की जगह लस्सी और एक फेमस मिठाई का आनंद जरूर लिया था।
फेसबुक मित्र डाक्टर साहब बनारस ही मिल गये थे तो साथ ही सारनाथ गये और शाम तक साथ ही रहे। विश्व के विभिन्न कोनों से आए विदेशी पर्यटकों की तादाद को देखकर , इस बौद्ध धार्मिक स्थल की अहमियत का अंदाजा लग जाता है।
सारनाथ में देखने के लिए विभिन्न देशों के बौद्ध अनुयायिओं की मदद से बनाए गए कई छोटे बड़े मंदिरों के आलावा, जैन मंदिर, हिरण उद्यान, बौद्ध विहार के अवशेष व एक बेहद प्रसिद्ध राजकीय संग्रहालय भी है जहां मैं और डाक्टर साहब रुके ही थे कि BHU Graduation Student यशवंत सिंह जैसे युवा मित्र अचानक से फोन कर मुझसे मिलने की इच्छा व्यक्त करते हैं , तो लगता है मेरा लेखन असर तो कर रहा है। ना जाने कितने भाई हैं जो हमें निरंतर पढ रहे हैं और हमें पता तक नहीं है । बहुत से हमारे लिये दिल में सम्मान लिये बैठे हैं पर कभी व्यक्त न कर पाये। मेरी ये यात्रा मित्रों से मिलने को ही थी और वो मकसद सफल भी हुआ। यशबंत सिंह मीडिया में जाकर इसे निष्पक्ष बनाने का सपना लिये बैठे हैं । इतनी कम उम्र में इतने अच्छे लेबल की राजनीतिक समझ रखना बहुत बडी बात है। इस सबके बाबजूद मेरे खुले विचारों से प्रभावित हैं । तीस किमी चलकर सिर्फ मिलने को सारनाथ पहुंचे । हमारे आने से पहले ही भाई  संग्रहालय  का टिकट ले चुके थे। यशबंत भाई आपने पैर छूकर जो मुझे इज्जत दी है, मैं कोशिष करूगां कि मैं इसके अनुरूप आचरण कर सकूं। नयी पीढी को इतना जागरूक देख कर बहुत  खुशी हुयी। संगृहालय के सामने ही पार्किगं थी जहां हमने अपनी बाइक्स खडी कर दीं थीं। मैं डाक्टर साहब की बाइक पर था। म्यूजियम में अदंर मोबाईल नहीं ले जाने दिया जाता है, अत: अदंर के फोटो न ले सके पर अदंर बुद्ध कालीन सभ्यता संस्कृति भाषा कला आदि के प्रमाण देखकर बहुत अच्छा लगा।
भगवान बुद्ध और बोधिसत्व की मूर्तियों के रूप में बौद्ध शिल्प का समृद्ध खज़ाना सारनाथ में स्थित है। बौद्ध कला की नायाब धरोहरों को इस संग्रहालय में स्थान दिया गया है।संग्रहालय के खुलने का समय सुबह 10 से शाम 5 बजे तक है। यह शुक्रवार को बंद रहता है। इसके अलावा सारनाथ में अन्य दर्शनीय स्थल भी हैं, जैसे:- धर्मराजिका स्तूप, राष्ट्रीय प्रतीक की भव्य लाट और सद्धर्मचक्र विहार के खुदाई में मिले अवशेष।यह भवन योजना में आधे मठ (संघारम) के रूप में है। इसमें ईसा से तीसरी शताब्दी पूर्व से 12वीं शताब्दी तक की पुरातन वस्तुओं का भण्डार है। सारनाथ में बौद्ध मूर्तियों का विस्तृत संग्रह है। दीर्घाएंयहाँ पाँच दीर्घाएं और दो बरामदे हैं। दीर्घाओं का उनमें रखी गई वस्तुओं के आधार पर नामकरण किया गया है, सबसे उत्तर में स्थित दीर्घा तथागत दीर्घा है जबकि बाद वाली त्रिरत्न दीर्घा है। मुख्य कक्ष शाक्यसिंह दीर्घा के नाम से जाना जाता है और दक्षिण में इसकी आसन्न दीर्घा को त्रिमूर्ति नाम दिया गया है। सबसे दक्षिण में आशुतोष दीर्घा है, उत्तरी और दक्षिणी ओर के बरामदे को क्रमश: वास्तुमंडन और शिल्परत्न नाम दिया गया है।संग्रहालय में प्रवेश संग्रहालय में मुख्य कक्ष से होकर प्रवेश किया जाता है। शाक्यसिंह दीर्घा संग्रहालय की सर्वाधिक मूल्यवान संग्रहों को प्रदर्शित करती है। इस दीर्घा के केन्द्र में मौर्य स्तंभ का सिंह स्तंभशीर्ष मौजूद है जो भारत का राष्ट्रीय प्रतीक बन गया है।संग्रहालय में संरक्षितबौद्ध कला की प्रतीक इन मूर्तियों को यहाँ के संग्रहालय में संरक्षित किया गया है।प्राचीन काल की अनेक बौद्ध और बोधित्व की प्रतिमाएं इस संग्रहालय में देखी जा सकती है।भारत के राष्ट्रीय प्रतीक अशोक स्तम्भ का मुकुट भी इस संग्रहालय में संरक्षित है।चार शेरों वाले अशोक स्तम्भ का यह मुकुट लगभग 250 ईसा पूर्व अशोक स्तम्भ के ऊपर स्थापित किया गया था।तुर्कों के हमले में अशोक स्तम्भ क्षतिग्रस्त हो गया और इसका मुकुट बाद में संग्रहालय में रख दिया गया।यक्ष प्रतिमा सारनाथ संग्रहालय में सुरक्षित है।यह यक्ष प्रतिमा प्रथम-द्वितीय शताब्दी ईसा पूर्व की है।विभिन्न मुद्राओं में बुद्ध और तारा की मूर्तियों के अलावा, भिक्षु बाला द्वारा समर्पित लाल बलुआ पत्थर की बोधिसत्व की खड़ी मुद्रा वाली अभिलिखित विशालकाय मूर्तियां, अष्टभुजी शाफ्ट, छतरी भी प्रदर्शित की गई हैं।त्रिरत्न दीर्घा में बौद्ध देवगणों की मूर्तियां और कुछ सम्बद्ध वस्तुएं प्रदर्शित हैं।सिद्धकविरा की एक खड़ी मूर्ति जो मंजुश्री का एक रूप है, खड़ी मुद्रा में तारा, लियोपग्राफ, बैठी मुद्रा में बोधिसत्व पद्मपाणि, श्रावस्ती के चमत्कार को दर्शाने वाला प्रस्तर-पट्ट, जम्भाला और वसुधरा, नागाओं द्वारा सुरक्षा किए जा रहे रामग्राम स्तूप का चित्रांकन, कुमारदेवी के अभिलेख, बुद्ध के जीवन से संबंधित अष्टमहास्थानों (आठ महान स्थान) को दर्शाने वाला प्रस्तर-पट्ट, शुंगकालीन रेलिंग अत्यधिक उत्कृष्ट हैं।तथागत दीर्घा में विभिन्न मुद्रा में बुद्ध, वज्रसत्व, बोधित्व पद्मपाणि, विष के प्याले के साथ नीलकंठ लोकेश्वर, मैत्रेय, सारनाथ कला शैली की सर्वाधिक उल्लेखनीय प्रतिमा उपदेश देते हुए बुद्ध की मूर्तियां प्रदर्शित हैं।त्रिमूर्ति दीर्घा में बैठी मुद्रा में गोल तोंद वाले यक्ष की मूर्ति, त्रिमूर्ति (ब्रह्मा, विष्णु और महेश) की मूर्ति, सूर्य, सरस्वती महिषासुर मर्दिनी की मूर्तियां और पक्षियों, जानवरों, पुरुष और महिला के सिरों की मूर्तियों जैसी कुछ धर्म-निरपेक्ष वस्तुएं और साथ ही कुछ गचकारी वाली मूर्तियां मौजूद हैं।आशुतोष दीर्घा में, विभिन्न स्वरूपों में शिव, विष्णु, गणेश, कार्तिकेय, अग्नि, पार्वती, नवग्रह, भैरव जैसे ब्राह्मण देवगण और शिव द्वारा अंधकासुरवध की विशालकाय मूर्ति प्रदर्शित है।अधिकांशत: वास्तुकला संबंधी अवशेष संग्रहालय के दो बरामदों में प्रदर्शित हैं।शांतिवादिना जातक की कथा को दर्शाने वाली एक विशाल सोहावटी एक सुंदर कलाकृति है।
संगृहालय भवन तो खजाना है। लेकिन यह उन्ही के लिये रुचिकर है जो इतिहास के जानकार हैं। संगृहालय घूम कर हम लोग सीधे धमेका स्तूप की और बढ चले। धमेका स्तूप परिसर बहुत बडा है। इसी परिसर में प्राचीन खंडहर और धर्मराजिका स्तूप के अवशेष भी हैं। एक तरफ घने वृक्षों की छाया में आगे बढती हुई पगडंडी तो सामने दूर दूर तक फैले हुयें ईंटो के बने हुये स्तूप। 
धर्मराजिका स्तूप  का निर्माण अशोक ने करवाया था। दुर्भाग्यवश 1794 ई. में जगत सिंह के आदमियों ने काशी का प्रसिद्ध मुहल्ला जगतगंज बनाने के लिए इसकी ईंटों को खोद डाला था। खुदाई के समय 8.23 मी. की गहराई पर एक प्रस्तर पात्र के भीतर संगरमरमर की मंजूषा में कुछ हड्डिया: एवं सुवर्णपात्र, मोती के दाने एवं रत्न मिले थे, जिसे उन्होंने विशेष महत्त्व का न मानकर गंगा में प्रवाहित कर दिया। यहाँ से प्राप्त महीपाल के समय के 1026 ई. के एक लेख में यह उल्लेख है कि स्थिरपाल और बसंतपाल नामक दो बंधुओं ने धर्मराजिका और धर्मचक्र का जीर्णोद्धार किया।1907-08 ई. में मार्शल के निर्देशन में खुदाई से इस स्तूप के क्रमिक परिनिर्माणों के इतिहास का पता चला। इस स्तूप का कई बार परिवर्द्धन एवं संस्कार हुआ। इस स्तूप के मूल भाग का निर्माण अशोक ने करवाया था। उस समय इसका व्यास 13.48 मी. (44 फुट 3 इंच) था। इसमें प्रयुक्त कीलाकार ईंटों की माप 19 ½ इंच X 14 ½ इंच X 2 ½ इंच और 16 ½ इंच X 12 ½ इंच X 3 ½ इंच थी। सर्वप्रथम परिवर्द्धन कुषाण-काल या आरंभिक गुप्त-काल में हुआ। इस समय स्तूप में प्रयुक्त ईंटों की माप 17 इंच X10 ½ इंच X 2 ¾ ईच थी। दूसरा परिवर्द्धन हूणों के आक्रमण के पश्चात् पाँचवी या छठी शताब्दी में हुआ। इस समय इसके चारों ओर 16 फुट (4.6 मीटर) चौड़ा एक प्रदक्षिणा पथ जोड़ा गया। तीसरी बार स्तूप का परिवर्द्धन हर्ष के शासन-काल (7वीं सदी) में हुआ। उस समय स्तूप के गिरने के डर से प्रदक्षिणा पथ को ईंटों से भर दिया गया और स्तूप तक पहुँचने के लिए सीढ़ियाँ लगा दी गईं। चौथा परिवर्द्धन बंगाल नरेश महीपाल ने महमूद ग़ज़नवी के आक्रमण के दस वर्ष वाद कराया। अंतिम पुनरुद्धार लगभग 1114 ई. से 1154 ई. के मध्य हुआ। इसके पश्चात् मुसलमानों के आक्रमण ने सारनाथ को नष्ट कर दिया।उत्खनन से इस स्तूप से दो मूर्तियाँ मिलीं। ये मूर्तियाँ सारनाथ से प्राप्त मूर्तियों में मुख्य हैं। पहली मूर्ति कनिष्क के राज्य संवत्सर 3 (81 ई.) में स्थापित विशाल बोधिसत्व प्रतिमा और दूसरी धर्मचक्रप्रवर्तन मुद्रा में भगवान बुद्ध की मूर्ति।

धमेख स्तूप (धर्मचक्र स्तूप) के पास खुदाई से प्राप्त बौद्ध मठयह स्तूप एक ठोस गोलाकार बुर्ज की भाँति है। इसका व्यास 28.35 मीटर (93 फुट) और ऊँचाई 39.01 मीटर (143 फुट) 11.20 मीटर तक इसका घेरा सुंदर अलंकृत शिलापट्टों से आच्छादित है। इसका यह आच्छादन कला की दृष्टि से अत्यंत सुंदर एवं आकर्षक है। अलंकरणों में मुख्य रूप से स्वस्तिक, नन्द्यावर्त सदृश विविध आकृतियाँ और फूल-पत्ती के कटाव की बेलें हैं। इस प्रकार के वल्लरी प्रधान अलंकरण बनाने में गुप्तकाल के शिल्पी पारंगत थे। इस स्तूप की नींव अशोक के समय में पड़ी। इसका विस्तार कुषाण-काल में हुआ, लेकिन गुप्तकाल में यह पूर्णत: तैयार हुआ। यह साक्ष्य पत्थरों की सजावट और उन पर गुप्त लिपि में अंकित चिन्हों से निश्चित होता है।कनिंघम ने सर्वप्रथम इस स्तूप के मध्य खुदाई कराकर 0.91 मीटर (3 फुट) नीचे एक शिलापट्ट प्राप्त किया था। इस शिलापट्ट पर सातवीं शताब्दी की लिपि में ‘ये धर्महेतु प्रभवा’ मंच अंकित था। इस स्तूप में प्रयुक्त ईंटें 14 ½ इंच X 8 ½ इंच X 2 ¼ इंच आकार की हैं|धमेक (धमेख) शब्द की उत्पत्ति के बारे में विद्वानों का मत है कि यह संस्कृत के ‘धर्मेज्ञा’ शब्द से निकला है। किंतु 11 वीं शताब्दी की एक मुद्रा पर ‘धमाक जयतु’ शब्द मिलता है। जिससे उसकी उत्पत्ति का ऊपर लिखे शब्द से संबंधित होना संदेहास्पद लगता है। इस मुद्रा में इस स्तूप को धमाक कहा गया है। इसे लोग बड़ी आदर की दृष्टि से देखते थे और इसकी पूजा करते थे। कनिंघम ने ‘धमेख’ शब्द को संस्कृत शब्द ‘धर्मोपदेशक’ का संक्षिप्त रूप स्वीकार किया है। उल्लेखनीय है कि बुद्ध ने सर्वप्रथम यहाँ ‘धर्मचक्र’ प्रारंभ किया था। अत: ऐसा संभव है कि इस कारण ही इसका नाम धमेख पड़ा हो। गोल धमेका स्तूप जो अदंर से खोखला है, में लोग ऊपर से रूमाल में पैसा बांध बांध कर  फैंक कर और वुद्ध के पांच शिष्यों को शिक्षा देने बाली मूर्तियों पर लोग कपडे पर अपनी मन्नत लिख कर जा रहे थे। बुद्ध ने राजनीतिक परिवार में जन्म लेने के कारण तत्कालीन समाज, धर्म  एवं राजनीति की गंदगी देखकर ही इससे अलग ब्राह्हण कर्मकांड, ऊंचनीच एवं अवतारवाद से परे एक समान समाज की कल्पना की थी लेकिन अफशोष ! वुद्ध के अनुयायिओं ने खुद बुद्ध को वही बना डाला जिसका कि विरोध उन्हौने किया था। इन तथाकथित भगवानों देवी देवताओं पैगम्बरों नवियों के समाज में इतना ऊंचा स्थान प्राप्त करने का कारण इनके राज्य में इनके आश्रित साहित्यकारों द्वारा लिखा गया इनका रहस्यात्मक एवं चमत्कारिक जीवन वर्णन है जिनमें इन्हें एक राजा की बजाय भगवान घोषित कर दिया गया और इनके हर गलत कार्य को भी इनकी लीला का नाम देकर समाज के लोगों को चुप करा दिया गया। आश्चर्य की बात है कि ऋषियों देवी देवताओं पैगम्बरों के  कारनामों को भी ईश्वर की इच्छा का नाम देकर हमें मूर्ख बनाया गया और हम खुशी खुशी बन भी गये क्यूं कि साहित्य तो उन्ही के चेले चपाटों ने लिखा था और उस पर मौहर ईश्वर की लगा दी ताकि कोई तर्क न कर सके। मुहम्मद साहव ने खुद को आखिरी पैगम्बर घोषित कर आगे अन्य सभी की दुकान बंद करने का पूरा बंदोवस्त कर दिया लेकिन फिर भी पैगम्बरों के आने का सिलसिला रूका नहीं, गुरूनानक, बाबा फरीद , औलिया, चिश्ती, दयानंद, विवेकानंद जैसे पैगम्बर समय समय पर आते रहे और आते भी रहेंगे पर भगवान वही कहलायेगा जिसके हाथ में राजनीतिक शक्ति होगी और चापलूस साहित्यकार होंगे। आश्चर्य की कोई बात नहीं होगी जब आने बाले समय में मुसलमान तो मुहम्मद को विष्णु के दसवें अवतार( कल्कि)  बता रहे होंगे जबकि भक्त लोग नरेन्द्र मोदी जी को।






















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