Tuesday, January 31, 2017

इलाहाबाद से बनारस : गंगा मैया में डुबकी

मौइन के गांव से बस दो घंटे में ही बनारस पहुंच गया था और घाट से कोई एक किमी दूरी पर ही रुम ले लिया था। हालांकि नजदीक भी लिया जा सकता था पर रिक्से बाले की बदमाशी से ऐसा हुआ था। खैर मात्र चार सौ रुपये बाले रूम में अपना बैग रख सीधा घाट की तरफ निकल लिया। स्नान जो करना था।

गंगा मैया को देखते ही भूल गया कि यहां कोई मंदिर भी है, ऐसा लगा जैसे ईश्वर से मुलाकात हो गयी, मंदिर जाना तो बस वास्तुकार की कला को निहारने एवं प्रशषां करने का एक नैतिक दायित्व भर है।
प्राकृतिक सौदंर्य को देखने के बाद  फिर किसी भगवान की आवश्यकता भी नहीं रह जाती क्यूं कि ये तत्व ही साक्षात ईश्वर हैं बाकी तो  इनका मानवीयकरण और मानव की कल्पना है।
गंगा में स्नान करने के लिये आपको नाव से उस पार जाना होता है, जहां दूर दूर तक रेत ही रेत नजर आयेगा। ठंडी ठंडी रेत में लोटपोट होने पर जो असीम आनंद मिलता है उसे या तो मेरे जैसा कोई पागल समझ सकता है या फिर विवेकानंद जी जैसा विद्धान जो शिकागो से लौटते ही भावविभोर होकर अपनी मातभूमि पर लोट पोट हो गये थे। नाव के दूसरी पार रूकते ही कपडे उतारे और कूद पडा मैया की गोद में। मैंने बैग से साबुन निकाला ही था कि एक बुजुर्ग बोले , बेटा मैया के पास सबकुछ है, थोडा ध्यान से खोजो। बस फिर क्या , मैं समझ गया, खूब सारी रेत शरीर पर लपेटी और घिस घिस के नहाया , कसम से शरीर चमक गया, उस रेत के आगे तो लक्स डव पीयर्स भी फेल हो गये। नदी की गहरायी की तरफ बढ रहा था तो थोडा डर लगा, कि तैरना नहीं आता है कहीं मां हमेशा के लिये तो नहीं सुला देगी पर मैया को भी पता था कि उसके नाती उसके बेटे की बाट जोह रहे हैं, उसने तो मुझे लहरों पर सुला दिया। मंदिरों की साईड बहुत सारे घाट बना रखे हैं जहां आप स्नान कर सकते हैं कितुं यहां नाव बालों एवं लोगों की इतनी भीड होती है कि स्नान करने का मन भी नहीं होता जब कि दूसरी ओर समुद्री बीच जैसा रेतीला तट है जहां दूर दूर तक सिर्फ स्नान करने बालों की ही भीड मिलेगी आपको।
आनंद की चरम सीमा भक्ति बन जाती है। ये मेरे लिये उसी आराधना साधना प्रार्थना और कामना के पल थे जिन्हें छोडने की इच्छा ही नहीं हो रही थी। वर्फ जैसा ठंडा जल मुझे आनंदित कर रहा था और गंगा मैया की गोद से निकलने का मन भी नहीं कर रहा था पर अभी मुझे अन्य भगवानों से मिलने की औपचारिक ड्यूटी भी पूरी भी करनी थी इसलिये तरोताजा होकर बापस घाट की तरफ चल दिया। मैं ये पल कभी न भूल पाऊगां ।


यदि आप सनातन के मूल में जायेंगे तो पायेंगे कि इसकी रग रग में सिर्फ प्रकृति ही समायी है। ये मंदिर ये घंटे घडियाल आरती पूजा ये सब तो सिर्फ बाहरी आबरण है जिसने कुछ हद तक दुनियां को सनातन से दूरी बनाने का एक बहाना भी दिया है। वाराणसी महज एक शहर नहीं अपितु आस्था विश्वास और मान्यताओं की ऐसी केन्द्र भूमि है जहां तर्को के सभी मिथक टूट जाते हैं, जीवंत रहती है तो सिर्फ समर्पण भरी आस्था। वाराणसी आस्था, विश्वास और पर्यटन का केन्द्र है। वाराणसी मौज मस्ती और अपने फन का अलग शहर है। इसका एक नाम काशी है तो दूसरा बनारस भी। यह नगरी धर्म, कर्म, मोक्ष की नगरी मानी जाती है। गंगा के मुहाने पर बसे इस शहर की छटा को निखारने वाले सौ से अधिक पक्के घाट पूरी नगरी को धनुषाकार का स्वरूप प्रदान करते हैं।काशी को यह गौरव प्राप्त है कि यह नगरी विद्या, साधना व कला तीनों का अधिष्ठान रही है।
धार्मिक महत्ता के साथ-साथ काशी अपने प्राचीनतम एवं मनोरम घाटों के लिए विश्व प्रसिद्ध है। ये घाट देशी-विदेशी पर्यटकों के लिए भी आकर्षण का केन्द्र हैं। प्रात:काल सूर्योदय के समय इन घाटों की छटा देखने योग्य होती है। गंगा के किनारे काशी के हर घाट का अपना अलग वैशिष्टय है। किन्तु सबसे महत्वपूर्ण घाट दशाश्वमेध घाट है। सन् 1735 में इस घाट को सर्वप्रथम बाजीराव पेशवा ने बनवाया।प्रशस्त पत्थरों से निर्मित यह घाट पंचतीर्थो में एक है। कुछ साल पहले तक बनारस के घाटों का भी वही हाल था जो अन्य का है लेकिन पिछले कुछ सालों में स्वच्छता के प्रति आश्चर्यजनक चेतना आयी है लोगों में। बापूजी के सपने को साकार करने का पूरा पूरा श्रेय मोदीजी को ही जाता है। बस एक बार कोई कुछ करने की ठान ले, राह तो बनती चली जाती हैं। यह भी एक मनोबैज्ञानिक प्रभाव की बात है, सौ टका सही है क्यों की एक हाथी जिसके अंदर अपार शक्ति होती है सब जानते है लेकिन हाथी अपनी क्षमता नही जान पाता है जो पैर में पड़ी बेड़ी की वजह से एक जगह जमा रहता है। अगर चाहे तो एक झटके में बेडियां तोड़ दे लेकिन नही उसके मन में बैठ गया है कि वो अब कहीं नही जा सकता। ठीक उसी प्रकार हम अपने मन में बिठा लिए हैं कि मेरे एक सफाई करने या रखने से देश में सफाई नही हो सकती है जो गलत है। हम अपने को सक्रिय कर सकते है कि हम से गंदगी न हो और न होने दे।
बनारस के नजदीक ही मुगलसराय के मित्र सज्जाद अली भाई जी मेरी पता चलते ही भागे चले आये। आज पूरा दिन इन्हीं के साथ बनारस की गलियां छान मारेंगे। मंदिर भी घूमेंगे। घाट पर गंगा आरती का भी आनंद लेंगे। खायेंगे पीयेंगे साथ घूमेंगे फिरेंगे। कुछ अपनी कहेंगे कुछ इनकी सुनेंगे। आज धर्म और आध्यात्म की बातें होंगी। आज गीता और कुरान एक साथ रखी जायें । शेष अगले ब्लाग में। 



















Monday, January 30, 2017

Allahabad tour

लखनऊ से इलाहाबाद के लिये सुवह तडके ही निकल पडा। तवी भाई ने एसी सिटिगं चेयर कनफर्म करा दी तो कोई दिक्कत नहीं आयी। लखनऊ जंक्शन बहुत बडा है, प्लेटफार्म का पहले ही पता कर लेना चाहिये वरना दौडते दौडते ही परेशान हो जाते हैं। सुवह नौ दस के बीच इसने मुझे इलाहाबाद उतार दिया। मौईन का गांव चालीस किमी दूर था जो हमने संतोष भाई के साथ ही कोई एक जगह चुन ली थी। वहीं पर तीनों की मुलाकात हो गयी। संतोष भाई अपनी कार लेकर आये थे इसलिये कोई दिक्कत नहीं आयी।
मैंने कभी सोचा न था कि " इंसानियत की आवाज " ग्रुप की शुरुआत में मौईन से बना रिश्ता मुझे इनके इतने करीब ले आयेगा। दिल के रिश्ते कभी जाति धर्म देखकर नहीं बनते, यदि बनते हैं तो विचारों की पवित्रता देखकर या दिल की सच्चाई देखकर। यदि विचारों में समानता न हो तो आपके सगे भाई भी  आपके अपने नहीं हो सकते, और विचार मिल जायें तो दुनियां के दूर किसी कोने में बैठा इंसान भी आपके इतना करीब आ जायेगा कि उसके आगे खून के रिश्ते भी फैल हो जाते हैं।
मौईन तवी आलोक मेराज अहसान मंसूर एमडी अली और संतोष भाई जैसे मित्रों के करीब आने की एक और प्रमुख बजह थी कि ये लोग भी मेरी तरह धर्म के गुलाम नहीं थे। धर्म की बुराईयों पर खुल कर चर्चा करना चाहते हैं । जहालियत से बाहर निकालना चाहते हैं। इसके लिये हमें ज्यादा कुछ नहीं करना है, बस एक बार थोडी सी हिम्मत जुटानी है कि हम अपने धर्मों की गुलामी से बाहर निकल कर सोच सकें और प्रश्न कर सकें। एक बार हम जाहिलियत से बाहर निकल आये और जान गये कि अल्लाह या ईश्वर कभी किसी को आदेश नहीं देता कि जाओ गैरों का सर काट दो, ये तो बस कुछ सियासी भेडिये हैं जो शिकार ढूंडते घूम रहे हैं तो समझ लीजिये कि फिर ना तो बगदादी किसी का सर कलम कर पायेगा और ना कोई अखलाक किसी की राजनीतिक साजिश का शिकार हो पायेगा।
संतोष भाई  फेसबुक पर दिन भर धार्मिक पात्रों की खिल्ली उडाते रहते हैं। पहले मैं भी ऐसा ही था लेकिन बाद में फेसबुक पर ही कुछ बडे बुजर्गों और बडे भाईयों ने सलाह दी कि नकारात्मक बिदुंओं को परोस कर आप कभी सुधार नहीं कर पाओगे, धार्मिक चेतना लाना चाहते हो तो सकारात्मक पक्ष को सामने लाओ। बस तभी से मेरी लेखनी ने मोड ले लिया और मैं बताने लगा कि ये परपंरायें क्यूं व कैसी बनीं एवं इनका महत्व क्या है ? मौईन आलोक तवी भी चेंज हो गये जबकि संतोष भाई अभी वहीं अटके पडे हैं। 
संतोष भाई की कार में हम तीनों चन्द्रशेखर पार्क की तरफ बढ चले। बहुत बडा पार्क है ये। बाहर गाडी पार्क कर पार्क में घूमते घामते आजाद की मूर्ति के पास पहुंच गये। अचानक से आखों के सामने वो मंजर आ गया जब पंडज्जी अपनी एक मात्र पिस्तौल से पेड की ओट में छिपकर ब्रिटिश पुलिस का सामना कर रहे हैं और अचानक से एक ही गोली रह जाती है। विकल्प सिर्फ मौत रह जाती है तो क्यूं न अपने हाथ ही मौत चुनी जाये और आजाद हमेशा के लिये गुलामी से आजाद हो जाते हैं। आज भी मूंछों पर ताव देते हुये पंड्डज्जी पार्क में खडे हैं और लोगों को बता रहे हैं कि ये आजादी बहुत मुस्किल से मिली है इसकी कद्र जरूर करना। 
पार्क में घूमने के बाद हम लोग संगम की तरफ बढ चले। गंगा जमुना सरस्वती का संगम बोला जाता है लेकिन सरस्वती कहीं दिखाई नहीं देती। वैदिक कालीन सरस्वती इधर कभी आयी भी न होगी । वह तो सिंधु नदी की सहायक नदी थी। हनुमानगढ जैसलमेर होते हुये सीधे पाकिस्तान चली गयी थी और अरब सागर में मिल गयी थी। यहां की सरस्वती तो कोई अन्य छोटी सी नदी रही होगी जो सूख गयी होगी। जब ज्ञान प्रदायिनी हिमालय की बेटी सरस्वती लुप्त हो गयी तो अन्य का भी क्या भरोषा ? संगम पर बहुत दूर चलने के बाद संगम नजर आता है, नाव में बैठकर जाना पडता है तब संगम नजर आता है क्यूं कि गंगा का पानी रोक दिया गया है इसलिये बस जमुना नजर आती है। नदियों को हमने मां माना है पर हमने उनकी कोई केयर नहीं करी। अतिश्रद्धा कहें या अंधविश्वास , घाट बहुत गंदे कर रखे हैं पंडो की दुकानदारी ने और लोगों की मूर्खता ने। चार साल पहले और गया था मैं गंगा घाट पर । फूल मालाओं एवं अन्य कचरे को देखकर दो चार से पूछना पडता था कि क्या समुद्र मंथन से निकली अम्रत की बूंदें यहीं गिरीं थीं ? कई साल पहले गंगा स्नान करने गया था, दूर से सफेद रेत और बहती जल धारा मुझे दिखीं तो पैर जल्दी जल्दी बढाने लगा। पर वहां पडे मल मूत्र की गंदगी के कारण हरेक कदम संभाल कर रखना पड रहा था। खैर उन दिनों हम भी पूरे धर्मांध थे सो महान आत्माओं संतों की पवित्र मलमूत्र से पवित्र होते पवित्र घाट पर पवित्र डुबकी लगाने कूद पडे। पर ये कोई गांव की पोखर थोडी ही ना थी जो भैंस की पूंछ पकड के तैर लेते । रेत में गढे खंभों और सांकड एक हाथ से पकड डुबकी लगाकर ऊपर आया तो गले में देर सारी पवित्र फूलों की माला का कचरा लटक गया। मुश्किल से हटा कर फेंका तो दूसरा फिर तीसरा पर पवित्र जल के दर्शन नहीं हो पा रहे मालाओं से। पास में ही दो सज्जन अपने 95 बर्षीय बुढऊ जिसकी हाथ में कैनुला लगी बोतल चडी रही थी, की अतिंम इच्छा पूरी करने आये थे। बुढऊ सोच रहे होंगे गंगाजी नहाकर लुढकुंगा तो स्वर्ग में उर्वशी मेनका जैसी अप्सराओं के बीच लुढकता रहूंगा। तेज लहर से बच गये वरना वहीं हो गया होता राम राम सत्य बुढऊ का। खैर पास ही तैर रहे एक लडके से ट्यूब की जुगाड कर मैं आगे बढा और फिर डुबकी लगायी और इस बार मेरे गले में फूलों की माला नहीं थी बल्कि किसी की बांहें थीं, सोचा भईया ने थाम लिया होगा पर जब गौर से देखा तो ये तो लाश थी। मेरे पैंट गीली तो पहले से ही थी अब तो पीली हो गयी। राम राम बोलूं तो भी मुंह से मरा मरा निकले। जैसे तैसे भईया ने स्वर्गलोकानुगामी लाश से पीछा छुडाया। उस दिन मेरी समझ में आया कि राजकपूर ने वो फिल्म क्यूं बनायी थी, शर्त लगा लो , वह भी डुबकी लगाने आया होगा, सोचा होगा कि मंदाकिनी मिलेगी पर फूलन देवी की लाश से मुलाकात करके चला गया होगा और जाते ही RK studio में चिल्लाने लगा होगा, "ओ राम तेरी गंगा मैली हो गयी , पापियों के पाप धोते धोते।"
इस बार भी नदी तट की वही हालत थी। हम तीनों ने एक नाव पकडी और संगम की ओर बढ चले। यमुना गंगा के संगम की ओर बढते हुये आप कुछ अनाज के दाने जरूर ले जायें, पक्षियों का कलरव देखने को मिलेगा। वो मंजर बडा सुहावना होता है। संगम के नजदीक ही नदी में बांस गाढ रखे हैं। वहीं हमारी नाव रुक गयी । कुछ लोग स्नान भी करते हैं वहीं पर। लेकिन ये बहुत खतरनाक हो जाता है कभी कभी। हम तो बिना स्नान किये ही बापस आ गये। 
इसके बाद तीनों ने एक शानदार रेस्ट्रां में साथ ही भोजन किया और फिर संतोष भाई ने हमें बस स्टैंड ड्राप कर दिया जहां से मुझे और मौईन को गांव जाना था। मौईन का गांव बनारस रोड पर ही था जहां से मुझे सुवह ही निकलना था।
एक घंटे की बस यात्रा के बाद मौईन के गांव पहुंचा। गांव के मुख्य भाग से थोडी सी दूर एकांत में हरे भरे खेतों के बीच घर है। पिताजी तो इस दुनियां में नहीं है। मां ने ही अपने बच्चों को पढा लिखा कर काबिल बनाया है। बेटियों को भी पढा लिखा कर उनके घर भेज दिया है। और अब मौईन एवं उसके भाई के बच्चे भी आधुनिक शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। अब सबकी समझ आ गया है कि दीनी तालीम से ही काम नहीं चलेगा, जीवन की दौड में सफल होना है तो दुनियावी तालीम भी हासिल करनी होगी।
मौईन का बेटा आकर मुझसे आदाब करने लगा तो मां ने इशारा किया किया, कि वो मुझे नमस्ते या रामराम करे। फिर वो मुझसे रामराम सा बोला। बच्चे ने अपने बालमन से ही वही किया जो उसके दिल में था। करना भी चाहिये। और हमें भी उसी के अभिवादन के अनुसार उसका जबाब देना चाहिये। चलते समय मां ने मेरे लिये मीठी मठरी की एक पोटली सी बांध दी थी जिसे मैं सारी गैल खाते आया था। एक मां की ममता की मिठास थी उस मठरी में। मौईन ने मुझे सऊदी अरब से लाया हुआ एक इत्र दिया जिसे लगाकर में बनारस के मंदिरों में गया था। भोलेनाथ भी खुश हो गये होंगे इत्र की खुशबू पाकर।


और इस प्रकार मां के चरण स्पर्श कर एवं बच्चों से मिलकर मैं बनारस के लिये रवाना हो गया। 







Sunday, January 29, 2017

लखनऊ के नबाब जीवन की भूलभुलैया में।

बनारस से सीधे घर के लिये निकल ही रहा था कि लखनऊ में तैयारी कर रहे एक छात्र Ravishankar Jaiswal जी मिलने की जिद करने लगे। और उधर तुषार भैया भी न मिल पाये थे पहले लेकिन अब वो भी दिल्ली से लौट आये थे। आखिरकार इनके प्रेम के कारण मुझे बापस आना पडा। इनके प्रेम की पराकाष्ठा तो तब समझ आयी जब ये कडकडाती ठंड की रात के दो बजे बीस किमी बाइक चलाकर मुझे स्टेशन लेने आये और अपने रूम पर ले आये। ये मुहब्बत थी जो एक अजनबी को भी इतना खींचे जा रही थी। अब बताईये ये प्रेम नहीं तो क्या है ? रिश्ते कहीं भी बन सकते हैं मेरी समझ आ रहा था अब। बस ह्रदय साफ होना चाहिये हमारा। श्री राम, लक्ष्मण एवम् सीता' मैया चित्रकूट पर्वत की ओर जा रहे थे,राह बहुत पथरीली और कंटीली थी कि यकायक श्री राम के चरणों मे कांटा चुभ गया ! श्रीराम रूष्ट या क्रोधित नहीं हुए, बल्कि हाथ जोड़कर धरती माता से अनुरोध करने लगे , "माँ, मेरी बस यही विनती है कि जब भरत मेरी खोज मे इस पथ से गुज़रे, तो आप नरम हो जाना ! कुछ पल के लिए अपने आँचल के ये पत्थर और कांटे छूपा लेना ! मुझे कांटा चुभा सो चुभा, पर मेरे भरत के पाँव मे अघात मत करना क्यूंकि भरत को यदि कांटा चुभा, तो वह उसके पाँव को नही, उसके हृदय को विदीर्ण कर देगा ! लेकिन "अपनी पीड़ा से नहीं माँ, बल्कि यह सोचकर कि...इसी कंटीली राह से मेरे भैया राम गुज़रे होंगे और ये शूल उनके पगों मे भी चुभे होंगे ! मैया, मेरा भरत कल्पना मे भी मेरी पीड़ा सहन नहीं कर सकता।
ऐसे होते हैं रिश्ते ! रिश्ते अंदरूनी एहसास, आत्मीय अनुभूति के दम पर ही टिकते हैं । जहाँ गहरी आत्मीयता नही, वहां वो रिश्ता शायद हो ही नही सकता सिर्फ एक दिखावा हो सकता है। इसीलिए कहा गया है कि...रिश्ते खून से नहीं, परिवार से नही, मित्रता से नही, व्यवहार से नही, सिर्फ और सिर्फ आत्मीय "एहसास" से ही बनते और निर्वहन किए जाते हैं। जहाँ एहसास ही नहीं, आत्मीयता ही नहीं ..
वहाँ अपनापन कहाँ से आएगा ? मानवता कहां से आयेगी।
रवि के रुम पर आकर पहले तो एक दो घंटे नींद निकाली और फिर नहा धोकर बाइक ले उडे भूल भुलैया की ओर जहां कि तुषार भैया हमसे मिलने आ रहे थे। भूलभुलैया पर हम पहुंचे तो तुषार भैया गेट पर ही हमारा इंतजार करते मिले। हमारे लिये आइस्क्रीम ले कर आये थे। हम भूलभुलैया में प्रवेश किये तो देखा कि बहुत सारी फोर्स इकट्ठा हो रही है। शायद मुसलमानों के शिया सुन्नी का कुछ मामला था। कभी कभी मुझे ये धरम वरम सब नौटंकी ही लगता है। पहले तो चलो इस बात का खून खरावा था कि तुम मूर्तिपूजक हो पर अब तो दोनों निराकार आस्था बाले ही हैं न ? अब काहै की लडाई ? दर असल ये लडाई स्वार्थ की है। संसाधनों पर कब्जा करने की है। ये कभी नहीं रुकने बाली। दुनिया के अंत तक संघर्ष होता ही रहेगा। कभी जाति के नाम पर तो कभी धर्म के नाम पर। 
खैर हम तो इमामबाडा में तो टहलते रहे और दुख सुख की बतियाते रहे। तुषार भैया का व्यवसाय चाहे कुछ भी हो पर उनकी जान साहित्य में ही अटकी है। बहुत ही उच्च कोटि के कलमकार हैं। फिल्मों के लिये कहानियां लिखते हैं। फेसबुक पर भी अक्सर तुषारापात करते रहते हैं। ऐसे बडे साहित्यकार के साथ मैं घूम रहा था। तभी ताबिस सिद्दिकी भाई से भी बात हो गयी। अम्बेडकर पार्क पर मिलना तय हुआ। मैं तुषार भैया के साथ कार में चल दिया जबकि रवि बाइक लेकर पीछे चला आ रहा था। कार में काफी देर हम साथ चलते रहे और रवि भी दिखाई न दे तभी अचानक से तुषार भैया की छठी इन्द्रिय कुछ आशंका व्यस्त करने लगी। बोले कुछ तो गडबड है। पता लगा रवि की बाइक खराब हो गयी है। तुषार भैया एक ज्योतिषाचार्य भी हैं। लोगों की कुंडली बनाते हैं। एक शब्द में कहूं तो पंड्डज्जी हैं। भाभी शिक्षिका हैं। फेसबुक पर दोनों के बीच खट्टी मीठी नोंकझोंक चलती रहती है। दोंनों के औनलाईन प्रेमालाप के बीच हम भी थोडा फुलझडी छोड आते हैं। जोडा जानदार है।
आपस में हंसी ठहाके लगाते तीनों अंबेडकर पार्क पहुंच गये और उधर तवी भाई एवं रोहित गुप्ता भी आ गये। तब हुआ पांच दोस्तों का महासंगम। वो
दिन तो वाकई मेरे लिये यादगार बन गया । Tushar Singh भैया दिन भर Tabish Siddiqui भैया पर तुषारापात करते रहे और हमें खूव हंसाते भी रहे।
 यदि मैं तुषार भाई की आम के पेड से तुलना करुं तो गलत न होगा। जितने बडे लेखक उतने ही विनम्र Down to Earth.
अम्बेडकर पार्क में इन बडे विचारकों के साथ घूमते देखा कि महात्मा बुद्ध की मूर्तियां उनके निर्माता मायावती की अपेक्षा छोटीं थीं। इन मूर्तियों के द्वारा खुद के व अपने राजनीतिक दल के प्रचार प्रसार पर काफी रूपया बहाया गया है,इसके एक गेट की कीमत में मेरा पूरा घर खरीद लिया जायेगा। मैं अष्ट धातु की एक अगूंठी नहीं खरीद पाता, यहां तो कई क्विटंल अष्ट धातु थी। मुझे लगता है कि ठीक ऐसा ही पूर्व में हुये भगवान और पैगबंर बने राजाओं के साथ भी हुआ होगा जिनके फालोवर्स ने ही इनके विचार या मान्यता को इतने बडे लेवल पर पहुंचा दिया होगा और ये खुद भगवान या ईश्वर के दूत बन बैठे जबकि हजारों लाखों गरीब ऋषि मुनि संत पीर फकीर जो इन तथाकथित दूतों से बडे ज्ञानी विचारक थे, लोगों तक अपने विचार पहुंचा भी नहीं पाये। आज जिन लोगों को हम ईश्वर के समकक्ष रख कर उनकी भक्ति कर रहे हैं और उनके नाम पर आपस में कट मर रहे हैं, वो भी कभी राजनीतिक व्यक्तित्व ही हुआ करते थे जिनके अपने कुछ फायदे नुकसान होते थे। आज के पांच सौ साल बाद अम्बेडकर काशीराम मायाबती भी अवतारवाद की चपेट में आ चुके होंगे जैसे कि आज महात्मा वुद्ध और मुहम्मद आ गये हैं। दलितों के आने बाली पीढियां अपने बच्चों को देवी के दसवें अवतार सुसरी मायावती की चमत्कारिक कहानियां सुना रहे होंगे। हो सकता है आगे जाकर , काली मां की तरह इनकी भी लपलपाती जीभ दिखा दी जाये और दस हाथ दिखा दिये जायं जिसके एक हाथ में मनु नामक राक्षस का सिर हो तो दूसरे में गांधी नामक भस्मासुर का ।
अंबेडकर पार्क में काफी देर मौज मस्ती करने के बाद तुषार भैया तो घर की तरफ निकल पडे लेकिन तवी भाई और रोहित गुप्ता जी हमें माल में Star wars दिखाने ले गये। दो दो चश्मा लगाकर मैंने जिन्दगी में पहली बार कोई फिल्म देखी। फिल्म शुरू होने में देर थी तो माल में घूमते रहे। भाईयों के साथ खूब जम के मस्ती किये। खाया पीया । बहुत आनंद आया।
Ravishankar Jaiswal भी कमाल का लडका है यार, हरदम मुस्कुराता ही रहता है। मुझे एहसास भी न था कि मुझसे इतना प्रेम करता होगा। सारा दिन घुमाया, दोस्तों से मिलवाया और शाम को ट्रैन तक छोड कर गया। जाते जाते भी भावुक कर गया, एक पैन गिफ्ट करते हुये बोल रहा था, सर आप बहुत याद आओगे। एक अध्यापक के लिये पैन से बडा और क्या उपहार हो सकता था। 















इस प्रकार अयोध्या बनारस सारनाथ इलाहावाद और लखनऊ के बहुत सारे दोस्तों की बहुत सारी खट्टी मीठी यादों को संजोये मैं घर के लिये रवाना हो गया। 



नबाबों का शहर लखनऊ : ताबिश सिद्दिकी भाई के साथ

मेरे इस टूर का उद्देश्य घूमना नहीं बल्कि दोस्तों से मिलना था, एक दो साल पहले ही आभाषी दुनियां में कुछ ""इंसानों"" से नयी दोस्ती हुयी थी, तो तीव्र इच्छा थी कि उन मानव धर्मावलम्बियों को शीघ्रातिशीघ्र अपनी रीयल दुनियां में शामिल कर लिया जाये बैसे भी भरोषा नहीं है कि नफरत के इस दौर में आगे जाकर कोई मानव मिल भी पायेगा कि नहीं। फेसबुक मित्रों के अलावा मेरे पुराने दोस्तों जो आगरा में मेरे साथ बी एड किये थे और मेरे सुख दुख के हिस्सेदार बने थे, से मिले भी दस साल बीत गये थे। देखना था कि कौन कैसा चल रहा है। देखना था कि समय की कठिन परीक्षाओं एवं राजनीतिक भेदभाव की कडवाहट कहीं विचारों में तो नहीं घुस गयी। ये तीनों पंडत जब मेरे पास ही रूम लेकर रह रहे थे तब एक भी पन्डित नहीं था, हम एक ही थाली में खाते थे और शाम को मेरी सीडी कैसेट की दुकान पर खूब मस्ती करते थे। बैसे ये तीनों पंडे थे तो बडे दिमागदार , पूरे कालेज में बस एक ही दोस्त बनाया, जाट और वो भी लोकल । मेरे होते किसी की मजाल नहीं थी कि इनकी तरफ कोई नजर उठा के भी देख सके पर यार मुझे भी तो दिमाग बालों की जरूरत थी न, क्यूं कि अपने पास था नहीं, शायद यही कारण था कि पहले राजा क्षत्रिय होता था और प्रधानमंत्री कोई महान ज्ञानी पंडित। हहह क्या दिन थे वो भी यार ! हम चारों एक ही बाइक पर बैठ कर पूरा आगरा क्रौस कर जाते और पुलिस बाला हमारे कालेज तक हमारा पीछा करता पर टैशंन नहीं था , मेरा पूरा खानदान पुलिस बाला है और नहीं होता तो पचास का नोट काफी था पर आज उन बातों को याद करता हूं तो ये लडकन या छिछोरपन नजर आता है जो शिक्षक बनने की निशानी बिल्कुल नहीं थी पर कोई नहीं , समय सब सिखा देता है, बैसे भी हम रोज कुछ नया सीखते हैं।
आशा करता हूं कि नये पुराने रिश्तों को गरमाहट देने की यह कोशिष जीवन में नये रंग जरूर भरेगी।
रात को प्रमोद तिवारी के पास फैजाबाद ही रुका था और सुवह ही लखनऊ के लिये शियाल्दा एक्सप्रैस पकड ली जिसने मुझे लगभग दस बजे तक लखनऊ पहुंचा दिया। इस बीच ताबिश भाई का बहुत बार फौन आ चुका था। खैर कुल मिलाकर मैं तवी भाई के घर पहुंच ही गया। घर पर ही मित्र रोहित गुप्ता जी से भी मुलाकात हुई। घंटे दो घंटे तक भाभी और बच्चों के साथ बतियाते रहे और फिर हम तीनों निकल पडे नबाबों की नगरी लखनऊ की सैर पर।सबसे पहले तवी भाई के औफिस पहुंचे और फिर बहां से गार्डन। दरअसल हमारा घूमने का कम और चर्चा का ज्यादा मन था। अत: हरे भरे बगीचे में बैठकर गप्पे लगाते रहे। क्रिसमस का त्यौहार था। लखनऊ के सबसे फेमस हजरतगंज बाजार में भीड उमडी पडी थी। बडे शहरों में व्यावसायिकता के चलते हर त्यौहार पर लोग टूट पडते हैं। अब धर्म बाला मामला तो बिल्कुल नहीं बचा। क्रिसमस पर भीड हिदुंओं की ही थी। हिंदुओं को तो बस सैलीव्रेट करने का बहाना चाहिये। तुरंत शुरू हो जाते हैं। और होना भी चाहिये। आखिर जीवन का उद्देश्य खुशी के अलावा और है ही क्या ? 
हजरतगंज के मार्केट में घूमते घामते तवी भाई को भूख लग आयी थी। जबकि मैं घर पर ही खाने का इच्छुक था पर भाई तो घुस गये एक शानदार से होटल में। गजब की डैकोरेशन कर रखी थी भाई होटल बालों ने। एकदम शानदार। एकदम वी आई पी व्यवस्था। खैर खाना पीना करके हम शहर की गलियां घूमते घामते घर पहुंच गये। 
जब मैंने सुवह आते समय चीकू ( तवी भाई का छोटा बेटा ) की तरफ दोस्ती का हाथ बढाया था तो साफ इंकार करते हुये हम से दूर चले गये, जो कि एक टीचर के लिये सबसे बडी चुनौती होती है, और जो बंदा बच्चे को अपने करीब लाना नहीं सीख पाया , मेरी निगाह में उसे टीचर बनने का हक भी नहीं है। मैं सुवह तो छोटू से बिना हाथ मिलाये तवी भाई के साथ बाहर चला गया था पर मुझे पता था कि मेरा नन्हा उस्ताद शाम तक मेरा दोस्त बन ही जायेगा। हहह मेरा काम ही यही है। यही मेरी जिंदगी है। दिन भर ऐसे बाल गोपालों में ही तो रहता हूं मैं। दरअसल किसी बच्चे का दोस्त बनने के लिये आपको उसके लेवल पर आना पडता है। बच्चे को तो सिर्फ प्रेम और अपनापन चाहिये। बडे बेटे जुबिन से तो सुवह पहली मुलाकात में ही दोस्ती हो गयी थी। सही बताऊं तो तवी भाई से ज्यादा तो मुझे इन दोनों से मिलने की चाह थी। जुबिन की बड्डे पर मैंने गिफ्ट का जो वायदा जो किया था वो भी तो निभाना था न । शाम को अपनी पैटिगं लेकर आ गये दोनों दोस्त। काफी देर मस्ती करते रहे। खूब खुलकर बातें करने लगे। सच पूछो तो यहां आकर बहुत कुछ मिला। खूब सारी बातें, ढेर सारा ज्ञान और खूब सारी मस्ती। मुझे एहसास ही नहीं हुआ कि हम पहली बार मिल रहे हैं। तवी भैया के परिवार से जो अपनापन मिला , शब्दों में व्यक्त नहीं कर सकता , बस इंतजार है कि ये परिवार जल्द मेरे गरीब खाने पर पधारे जिससे मैं प्यार के बदले प्यार दे सकूं। और हमें चाहिये ही क्या ? मैं तो प्रेम पुजारी हूं । मिलने मिलाने और अपना बनाने की ये मुहिम मेरे लिये कोई नयी नहीं है। यही काम मैं पिछले बीस पच्चीस वर्ष से कर रहा हूं । चूंकि पच्चीस वर्ष में लगभग पूरा भारत घूम चुका हूं तो जाहिर सी बात है कि राह में सैकडों साथी बने होंगे।इसके अलावा मेरे ऐसे होने की मूल बजह है कि मेरे पापा पूरे तीस साल जगह जगह नौकरी करते रहे। हमें जगह जगह रहने का मौका मिला। तरह तरह के लोगों के साथ उठना बैठना और फिर विपरीत परिस्थितियों में उन्ही परायों का विपत्ति में साथ खडे होना। बस ऐसे ही जाति धर्म ऊंच नीच अमीरी गरीबी जैसी संकीर्ण सोच से ऊपर उठकर मानवतावादी विचारों का जन्म हुआ होगा।






लेकिन फेसबुक ने मौका दिया कि मैं उन विचारों को अमली जामा पहना सकूं । सर्दियों की छुट्टियों में मेरी इस यात्रा का असली उद्देश्य भी मानव धर्म का प्रचार प्रसार ही था। मुहब्बत की ये मशाल अब बुझने न दी जायेगी।
शाम को तवी भाई ने बहुत ही शानदार खाना बनवाया। हालांकि मैं नौनवैजीटेरियन हूं पर अब धीरे धीरे शाकाहारी हो चला हूं। मिर्च मसाले बाली सब्जियां या नौनवेज पचता नहीं है अब । इसलिये तवी भाई ने बहुत ही सात्विक भोजन करवाया। मटर मशरुम जिसका मैंने नाम तक न सुना था और तवी भाई की फेवरेट सब्जी है, मुझे खिलायी। पहली वार खायी। आनंद आ गया। परिवार के साथ बैठ कर खाओ तो इंसान दो रोटी और ज्यादा खा जाता है। 
भोजन के बाद काफी देर धर्म और मजहब पर चर्चा चलती रही। दर असल ये टोपिक हम दोनों का ही फेवरेट है।मेरी जिंदगी के ये पहले मुसलमान थे जिनको मैंने नबी और कुरान पर उंगली उठाते और सनातन की तारीफों के पुल बांधते देखा था। और इधर मैं था कि देवी देवताओं की धज्जियां उडाये जा रहा था।इस्लाम के एकेश्वरवाद से प्रभावित था। दोनों का एकदम उलट मामला फिर भी लगाव बढता ही गया। पता नहीं क्यूं ? 
सच बताऊं तो मैं तवी भाई को पढ पढ कर ही सीखा हूं। फेसबुक पर पहले मठाधीश ये ही थे जिनसे मैं प्रभावित हुआ था। हालत ये थी कि इंतजार करता रहता था कि इनकी अगली पोस्ट कब आयेगी। उन दिनों ये दिल्ली में रहा करते थे और एक बार मैं बुक फेयर के बहाने इनसे मिलने दिल्ली भी चला गया था पर मुलाकात न हो सकी थी। हजरतगंज में घूमते हुये मैंने तवी भाई से पूछा था कि भाई फेसबुक पर लोग मुझे वामपंथी कहते हैं । ये बताओ कि ये वामपंथी कौन होते हैं और इनकी क्या सोच होती है ? मैंने तो सुना है कि वामपंथी ऐसे नास्तिक होते हैं जो अपने बीबी बच्चों तक से प्यार नहीं करते। खून की खोली खेलने में शान समझते हैं ? तब उस दिन उन्हौने मुझे वामपंथ की सही परिभाषा समझायी थी और मतलब भी समझाया था। हालांकि मैं तो वामपंथी नहीं रहा । बदल गया मैं। नास्तिक से आस्तिक बन गया। 
उस दिन देर रात तक हम लोग धर्म और मजहब की अन सुलझी पहेलियों को सुलझाते सुलझाते कब सो गये पता ही नहीं चला। तवी भाई ने रात को ही बनारस के लिये मेरा ऐसी टिकट करवा दिया था और पैसे भी नहीं लिये थे। बाद में भी नहीं लिये। ये उनका उधार है मेरे ऊपर । जिंदगी रही तो कर्ज जरूर चुकाऊंगा लेकिन उस मुहब्बत को कैसे चुका पाऊंगा जो इस परिवार ने मुझे दी थी। सुवह ही जल्दी नहा धोकर बिना तवी भाई को जगाये इलाहावाद के लिये निकल लिया। इलाहाबाद और फिर बनारस की कहानी आगे सुनाऊंगा लेकिन तवी भाई से एक बार और मिलना लिखा था किस्मत में।