Monday, September 25, 2017

उत्तराखंड चारधाम यात्रा : धौलपुर से नैनीताल, अल्मोडा गोलू देवता।

रुद्रपुर गुरुद्वारे में सुवह जल्दी ही नींद खुल गयी। नहा धोकर मत्था टेकने ऊपर गया। थोडी देर वहां बैठा और फिर निकल लिया नैनीताल की तरफ। रुद्रपुर से निकलते ही रास्ता एकदम मस्त हो चला था। सडकें भी जानदार और हरा भरा माहौल भी। काठगोदाम में चाय नास्ता लिया और बढ गया ऊपर की तरफ। काठगोदाम के बाद हिल ऐरिया शुरू हो जाता है। घने जंगल में बल खाती सडकों पर गाडी चलाने में बहुत ध्यान रखना पडता है। थोडी सी चूक जानलेवा साबित हो सकती है इसलिये घुमक्कडों को यही सलाह दुंगा कि जब भी कोई प्राकृतिक सुंदरता आपको अपनी ओर खींचे, बाइक तुरंत रोक लो। मन भर कर सुंदरता को समेट लो और फिर दौड पडो। चलते हुये निगाह सामने ही रखो। जैसे जैसे ऊपर चडता जा रहा था, पहाडों की सुंदरता बढती ही जा रही थी। खूब धीमे चला फिर भी आठ बजे तक नैनीताल पहुंच गया। रुद्रपुर से नैनीताल 80 किमी है जिसे कवर करने में मुझे दो घंटे लगे। मेरा डेस्टीनेशन अल्मोडा से आगे जालेश्वर महादेव था इसलिये नैनीताल को बस नजर भर देखना ही था। बैसे भी मैं नैनीताल पहले आ चुका हूं। बस पुरानी यादें ताजा करनी थीं।
नैसर्गिक सौंदर्यता को अपने आप में समेटे हुए नैनीताल एक बेहद खूबसूरत जगह है ।  नैनीताल दो भागों में बटा हुआ है दक्षिण की तरफ तल्लीताल और उत्तर की तरफ मल्लीताल । बस और टैक्सी स्टैंड, गवर्नर हाउस और गोल्फ कोर्स तल्लीताल में स्थित है जबकि मल्लीताल में रिक्शा स्टैंड ,हाई कोर्ट ,तिब्बती बाजार ,बड़ा बाजार और केव गार्डन स्थित है। पुराणों के अनुसार जब प्रजापति दक्ष ने शिव को अपने यहां यज्ञ का निमंत्रण नहीं दिया , तब सती ने अपने पति का अपमान देखकर यज्ञ में कूद अपनी जान दे दी।  इससे क्रोधित होकर शिव सती का पार्थिव शरीर लेकर इधर-उधर घूमने लगे।  शिव की इस दयनीय स्थिति को देख कर, चिंतित होकर सभी देवतागण चिंतित होकर  भगवान विष्णु के पास पहुंचे और कुछ उपाय करने को कहा ,जिसको सुनकर विष्णु भगवान ने अपना सुदर्शन चक्र चलाया जिससे सती के पार्थिव शरीर के छोटे-छोटे टुकड़े होते चले गए माना जाता है कि यह टुकड़े जहां भी गिरे वहां शक्तिपीठ बनते चले गए और नैनीताल भी इन्हीं शक्तिपीठों में से एक है। देवी सती की बाई आंख नैनीताल में गिरने से यहां की ताल का आकार आंख की तरह है। नैनीझील ही इस जगह का मुख्य आकर्षण है। हरे पानी की ये झील चारो तरफ हरे और ऊँचे पहाड़ो से घिरी हुई है।  इस पर चलती हुई पाल नौकाए इस खूबसूरत जगह म चार चांद लगा देती है।  बिना नौकायान के नैनीताल की यात्रा अधूरी है। नैनीझील को त्री”- ऋषि  सरोवर” के नाम से भी जाना जाता है।नैनी झील की उत्तरी छोर पर बने बोट हाउस क्लब पर्यटको के लिए एक अच्छा स्थल है। यहां की मधुशाला में लकड़ी से निर्मित फर्श और झील की तरफ लगे हुए फर्नीचर पर बैठ कर झील को निहारना एक अलग ही एहसास  देता है।नैनीताल को पूरा घूमने के लिये कम से कम दो दिन चाहिये। ताल का पानी बेहद साफ है और इसमें तीनों ओर के पहाड़ों और पेड़ों की परछाई साफ दिखती है। आसमान में छाए बादलों को भी ताल के पानी में साफ देखा जा सकता है। रात में नैनीताल के पहाड़ों पर बने मकानों की रोशनी ताल को भी ऐसे रोशन कर देती है, जैसे ताल के अंदर हजारों बल्ब जल रहे हों। ताल में बत्तखों के झुंड, रंग-बिरंगी नावें और ऊपर से बहती ठंडी हवा यहां एक अदभुत नजारा पेश करते हैं। ताल का पानी गर्मियों में हरा, बरसात में मटमैला और सर्दियों में हल्का नीला दिखाई देता है।तल्लीताल से मल्लीताल को जोडने वाली सडक पर झील के किनारे किनारे हरे भरे पेडों की छांव में चलना एक अलग ही आनंद प्रदान करता है। झील के ऊपरी हिस्से की तरफ एक बडा सा मैदान है जिसके एक तरफ मंदिर और गुरुद्वारे हैं तो दूसरी तरफ मस्जिद। यहीं पर भोटिया मार्केट है जहां सैलानियों की भीड लगी रहती है। यहां खाने पीने की चीजों से लेकर गर्म कपडों तक हर चीज मिल जायेगी आपको। 
मेरे पास इतना समय नहीं था कि मैं चाईना पीक या डोरोथी सीट जा पाता। केबल कार में बैठ पाता। मुझे तो अल्मोडा से आगे जागेश्वर धाम पहुंचना था अत: भुवाली होते हुये अल्मोडा की तरफ निकल लिया। नैनीताल से अल्मोडा करीब 70 किमी पडता है और फिर वहां से 35 किमी जागेश्वर धाम। कुमाऊं क्षेत्र के पहाड़ों की ओर जाने वाली सड़कों का भुवाली में चौराहा है और यह नैनीताल से करीब 11 किमी दूर है। भुवाली को उसकी खूबसूरती के लिए जाना जाता है। घोड़ाखाल में ग्वेल (गोलू) देवता का विशाल मंदिर है।यहां भक्त आकर उनसे अपनी मनोकामना पूरी करने की अर्जी लगाते हैं। इसके अलावा घोड़ाखाल को सैनिक स्कूल के लिए भी जाना जाता है।घोड़ाखाल का सैनिक स्कूल देश के सबसे प्रतिष्ठित स्कूलों में से एक है। अल्मोडा से जागेश्वर धाम की तरफ बढते हुये करीब दस किमी बाद चित्तई गांव में एक ऐसा मंदिर दिखाई देता है जिसमें चारों ओर घंटियां ही घंटियां नजर आती हैं । लोग कागज पर अपनी अपनी अर्जियां यहां टांग जाते हैं। गोलू देवता या भगवान गोलू उत्तराखंड राज्य के कुमाऊं क्षेत्र की प्रसिद्ध पौराणिक देवता हैं। अल्मोड़ा स्थित गोलू देवता का चितई मंदिर बिनसर वन्य जीवन अभयारण्य से भी नजदीक ही है और अल्मोड़ा से तो मात्र दस किमी दूर है। मूल रूप से गोलू देवता को गौर भैरव (शिव ) के अवतार के रूप में माना जाता है। कहा जाता है कि वह कत्यूरी के राजा झाल राय और कलिद्रा की बहादुर संतान थे। ऐतिहासिक रूप से गोलू देवता का मूल स्थान चम्पावत में स्वीकार किया गया है। एक अन्य कहानी के मुताबिक गोलू देवता चंद राजा, बाज बहादुर ( 1638-1678 ) की सेना के एक जनरल थे और किसी युद्ध में वीरता प्रदर्शित करते हुए उनकी मृत्यु हो गई थी। उनके सम्मान में ही अल्मोड़ा में चितई मंदिर की स्थापना की गई। चमोली में गोलू देवता को कुल देवता के रूप में पूजा जाता है। चमोली में नौ दिन के लिए गोलू देवता की विशेष पूजा की जाती है। इन्हें गौरील देवता के रूप में भी जाना जाता है।
जागेश्वर नजदीक ही था अब। दिन भी बाकी था लेकिन बादल घिर आये थे। हल्की हल्की बूंदो ने मौसम सुहावना बना दिया था। यहां से आगे का वर्णन अगले ब्लाग में होगा।










satyapalchahar.blogspot.in



Wednesday, September 20, 2017

घुमक्कडी दिल से

मैं अक्सर लोगों को रोते देखता हूं। कभी किसी पद के लिये कभी दौलत के लिये तो कभी संतान के लिये। फिर अचानक से टीवी पर खबर देखता हूं कि बक्सर के जिला कलैक्टर अवसाद में रेल से कटकर जान दे देते हैं। ऐसे अनगिनत केसेस हैं जिनमें करोडपति लोग या बहुत बडे पद वाले लोग जीवन से निराश होकर घुटन की जिंदगी जी रहे हैं।
ऐसे में सवाल उठता है कि जीवन का लक्ष्य क्या होना चाहिये ? ऐशो आराम ? पद ? दौलत ? या खुशी ?
यदि आपका जवाब खुशी है तो उसके लिये उपरोक्त तीनों चीजों की कोई आवश्यकता नहीं है। बस इच्छा शक्ति चाहिये खुश रहने की। मुझे खरहरी खाट पर सोने से खुशी मिलती है तो मैं डनलप के गद्दे के लिये क्यूं विलाप करुं ? सिर्फ इस बजह से कि मेरा पडौसी डनलप के गद्दों पर करवटें बदलता रहता है ?  असंतोष तनाव देता है और तनाव दुख देता है । दुख मौत है जीवन नहीं। जीवन जीने के लिये छोटे छोटे से बहाने ही काफी होते हैं। खुशी का क्या है कहीं भी मिल जाती है। रोते हुये किसी बच्चे को हंसा दिया मिल गयी खुशी। किसी नंगे बच्चे को नेकर बनियान पहना दिया मिल गयी खुशी। ऐसी ही छोटी छोटी खुशियां मैं ढूंडते रहता हूं। ऐसे में अगर कोई नवयुवक दोस्त आकर आपके खुशी लेने की विधि में शरीक हो जाये तो आपकी खुशी डबल हो जाती है। मेरे पिता ने गरीबी देखी थी। मेरी मम्मी हमारी नेकर के पीछे से फटने पर उस पर थेगडी लगा दिया करती थी। हमें उसमें भी बहुत खुशी मिलती थी। आज जब ईश्वर ने हमें किसी लायक बना दिया है तो क्यूं न कुछ बच्चों को ये छोटी छोटी खुशियां जुटायीं जांय।इसके लिये किसी बहुत बडे बजट की जरूरत नहीं होती। किसी भी रंगीन पहाडे की फोटो स्टेट कराईये। मुस्किल से पांच रुपये में पूरा पहाडा जिसमें कक्षा पहली दूसरी और तीसरी की पूरी पढाई होती है, तैयार हो जाता है। मुस्किल से सौ रुपये में बच्चों को वो पहाडा मिल जायेगा। आपके सौ रुपये में बहुतों को खुशी मिल गयी।
ये तो तय है कि आपकी नीयत पाक हो, उद्देश्य पवित्र हो, आपके किसी कार्य में रुकावट नहीं आ सकती। ये दुनियां अच्छे इंसानों से भरी पडी है। आप कोई नेक काम करने निकल पडो, वो आपको खुद ही ढूंड लेंगे।
जैसा कि आपको मालुम है कि हमारे स्कूलों में अधिकांशत गरीब मजदूरों और किसानों के बच्चे पढते हैं। पिछले पांच साल से अपने बच्चों को सर्दियों में ठिठुरते देख रहा हूं। पिछली साल मैं और मेरा स्टाफ सीमित मदद ही कर पाये थे। इस बार मित्रों से सहायता लेने का विचार बनाया। थोडा सकुचाते हुये एक पोस्ट डाल दी थी। गजब का रैसपौसं मिला। बहुत सारे साथी मदद के लिये आगे आये।
आज बच्चों के लिये स्वेटर खरीदने के लिये निकल रहा था कि बाजार में तीन चार फेसबुक मित्रों ने रोक लिया। साक्षात मुलाकात पहली वार हो रही थी। मित्रों ने बस इतना ही कहा कि आप जिस नेक कार्य के लिये जा रहे हैं, उस पवित्र हवन कुंड में एक छोटी सी आहूति हमारी भी स्वीकार कीजिये। सरस्वती मां के मंदिर में विराजमान छोटे छोटे इन बाल गोपालों के लिये कभी भी कोई जरूरत पडे, हमें जरूर याद किया कीजिये भाई। ऐसा बोलकर तीनों मित्रों ने मुझे कुछ रुपये दे दिये थे। मैं घर चला आया। शाम को मुरादाबाद निकलना था। स्टेशन निकलने से पहले बकील साहब संजीव गुप्ता जी का फौन आया कि थोडी देर के लिये मिलना चाहता हूं। रास्ते में मुलाकात हुई तो कुछ हजार रुपये देते हुये बोले, ये मेरी पत्नि ने भिजवाये हैं। वो एक शिक्षिका हैं और बच्चों में ही भगवान तलाशती हैं। साक्षात भगवानों के लिये इस छोटी सी भेंट को भी स्वीकार कीजिये। दोनों पति पत्नी की नेकनीयती को सलाम करते हुये मैं स्टेशन की तरफ निकल पडा। 
इस बार तीन दिन की छुट्टियां बहुत ही नेक काम के लिये खर्च की हैं। जैसा कि मैं पहले ही बता चुका हूं कि मुरादाबाद के मेरे फेसबुक मित्र श्री Rajeev Kumar Agarwal जी ने मेरे स्कूली बच्चों के लिये स्वेटर देने का वायदा किया था। राजीव भाई प्रिटिंग प्रैस चलाते हैं। बेटा बैंक अधिकारी है। बेटी उच्च शिक्षा प्राप्त कर रही है। राजीव भाई गरीब बच्चों की शिक्षा के लिये अक्सर चैरिटी करते रहते हैं। अभी कुछ दिनों पहले ही एक और स्कूल के बच्चों के लिये इन्होने बीस हजार भेजे हैं। मुरादाबाद में इनके परिवार के सभी सदस्यों से मिला। बहुत ज्यादा प्रेम और सम्मान मिला। जनरल डिब्बे में यात्रा की थकान भी बढ जाती है। राजीव भाई के घर स्नान करते ही थकान दूर हो गयी। फिर साथ में खाना खाया और रात को ही लुधियाने के लिये निकल पडा।

लुधियाने में सुवह से शाम तक स्वेटर की रेट लेते हुये बाजार में घूमता रहा। बहुत बडा बाजार है। करीब दस बीस किमी तो पैदल चल लिया हुंगा। लुधियाने में बडे भाई जैसे मित्र G N Singh Grewal जी शिक्षक हैं जो शाम को स्कूल से फ्री होने थे। तब तक मुझे बाजार में रेट ट्राई करना था। शाम को उन्हौने अपने जानकार मित्र की फैक्ट्री से मुझे 114 स्वेटर इतनी कम कीमत पर दिलवाये कि मैंने उन्ही रुपयों में से बच्चों के लिये टोपे भी खरीद लिये। जब फैक्ट्री मालिक अनिल सहगल जी को पता लगा कि हम लोग गरीब बच्चों के लिये चैरिटी कर रहे हैं तो काफी भावुक हो गये और लागत कीमत पर ही हमें गर्म कपडे देना स्वीकार किया। सहगल जी के पास हम करीब दो घंटे बैठे । उसी दौरान उन्हौने हमें बताया कि कभी मैं भी इन्ही बच्चों की तरह था। बहुत कठोर परिस्थितियों से गुजरते हुये रात दिन मेहनत करके आज इस स्थिति में पहुंचा हूं। सहगल साहब का बेटा लंदन का जाना माना फैशन डिजायनर है।



" बेटी बचाओ बेटी पढाओ" का स्टीकर हर ड्रैस पर चिपकाते हैं सहगल साहब। ये बहुत अच्छा लगा मुझे। व्यापार के साथ साथ आप समाज को कोई मैसेज भी दे जांयें तो इससे अच्छी बात कोई हो नहीं सकती। इस छोटी सी यात्रा में मैंने एक बात सीखी है कि हमको दुनियां में बुराई केवल तभी दिखती है जब हम खुद बुरे होते हैं। और जब हम अपने मन को साफ कर पवित्र मन से नेकनीयती के साथ कोई नेक कार्य करने निकल पडते हैं, इतने सारे अच्छे लोग मिलते हैं कि संभालना मुश्किल हो जाता है।
संजीव गुप्ता परिवार, कमलजीत सिंह , मुकेश सक्सैना जी, राजीव अग्रवाल जी, अनिल सहगल जी और बडे भाई ग्रेवाल जी ने तो इस पवित्र कार्य में अपना सहयोग प्रदान किया ही है, इसके अलावा बहुत सारे मित्र और भी हैं जो गरीब बच्चों के लिये मदद हेतु आगे आये। 
लुधियाना जाते समय मैं मथुरा में था तभी रू देश में रहने वाले मित्र ठा उमेश प्रताप सिंह जी का मैसेज मिला कि मैंने वैस्टर्न यूनियन से बच्चों के लिये कुछ मदद भेजी है, आप कलेक्ट कर लीजिये। मैसेज देखा । 11334 रुपये थे। दिल खुश हो गया। क्यूं कि अभी तक जुटाये पैसों से स्वेटर टोपे ही आ रहे थे , अब मैं उनके लिये बैग भी खरीद सकता था। उमेश भैया को फेसबुक से ही जानता हूं। अभी तक मुझे बस इतना ही पता था कि ये स्पैनिश टीचर हैं। स्पैनिश और हिंदी संवाद पढाते हैं। बाद में जाना कि स्वास्थ्य के क्षेत्र में व्यवसाय करते हैं। दवाइयों की ट्रेडिंग और फार्मासूटिकल रेगुलेटरी कन्सल्टन्सी का व्यक्तिगत मुख्य कार्य है  ,  आयुर्वेदिक प्रचार प्रसार , हिंदी का प्रचार प्रसार सम सामायिक कार्य है  जो कि भारतीय दूतावास के साथ मिलकर करते हैं। हालांकि शैक्षणिक योग्यता रसायन विज्ञान  में परास्नातक है। और बिना डिग्री के इनकी योग्यता एक मोटिवेटर- काउंसलर  की है।भारतीय दर्शन और व्यवसायिक प्रबंधन इनके पसंदीदा विषय है , भारतीय वैदिक  ज्योतिष  और आयुर्वेद में गहरी रूचि रखते हैं। विदेश आने का कोई प्लांड प्रोग्राम नहीं था बस नौकरी करते करते आ गये और आगये तो बस टिक गये।
satyapalchahar.blogspot.in
मैंने इस पूरी यात्रा बस एक बात का अनुभव किया है कि अच्छाई भी बहुत तेजी से फैलती है। मथुरा के एक सज्जन के यहां वहां के स्कूलों में बंटने वाली कुछ ड्रेसेस रखी थीं। बंट भी न पायी कि सरकार बदल गयी और ड्रेस भी। दो महीने से रखी थीं। मुझे फौन आया कि आप इन गरीब बच्चों तक पहुंचवा दीजिये। नंगे बदन पर कुछ तो आयेगा। 
कहने का मतलब है एक बार आप निकल पडो। रास्ते बनते चले जाते हैं। शुरूआत छोटी से छोटी भी हो सकती है। बस मकसद बडा होना चाहिये और दिल भी बडा होना चाहिये।
इस सब काम का श्रेय मैं अपने दो नवयुवक शिक्षक साथियों रोहित गर्ग और अरविंद कुमार को देना चाहूंगा जो बहुत कठिन मेहनत और संघर्ष के बाद नियुक्त हुये हैं। इस नेक पहल की शुरूआत उन दोनों ने ही करी थी। दो दो हजार रुपये देकर हमारे सामने प्रस्ताव रखा जिसे बाकी हम तीनों ने सहर्ष स्वीकार कर लिया।
कुल मिला कर ये यात्रा बहुत अच्छी रही। इस बार करी है मैंने " घुमक्कडी दिल से "।











Saturday, September 9, 2017

उत्तराखंड चार धाम बाइक यात्रा: सत्य का सनातनी सफर

बाइक से निकलना मेरी मजबूरी थी जो अब मेरी जरूरत बन चुकी है। बस कार जैसी बंद गाडियों में दम घुटता है। अब तो बस ट्रैन या फिर बाइक। कभी यदि चार पहिया वाहन से जाना भी हुआ तो छत पर बैठकर ही जाऊंगा। यह मेरा सौभाग्य है कि भारत के हर छोटे बडे शहर में फेसबुक मित्र मिल जाते हैं जो मुझे बाइक उपलब्ध करा देते हैं हालांकि ज्यादातर तो मैं घर से ही बाइक लेकर निकलता हूं। एक मित्र अभी कह रहे थे कि मुझे भी अगला सत्यपाल बनना है। मैं ऐसी सलाह कभी नहीं दूंगा क्यूं कि सत्यपाल बनने के लिये पागल होना जरूरी शर्त है। घुमक्कडी के लिये पागल। न घर से लगाव और न सुख सुविधाओं से। चने खाकर भी घूम लेता हूं। जनरल डिब्बे में खचाखच भीड में एक पैर पर खडे होकर भी यात्रा कर लेता हूं। फुटपाथ पर सो लेता हूं। मैं वहां भी जाता हूं जहां अक्सर लोग जाना नहीं चाहते। मैं किसी क्षेत्र में रह रहे किसानों मजदूरों आदिवासियों के बच्चों से मिलने उनके घर पहुंच जाता हूं। मुझे मंदिर मस्जिदों गुरूद्वारों की पूजा पद्धति से ज्यादा वहां शामिल होने वाले लोगों से मिलने और उन्हें जानने में ज्यादा रुचि रहती है कि वे लोग यहां क्या पाने आये हैं। मैं देशभर के मंदिरों की खाक छानते फिरता हूं पर भगवान कभी नहीं मिलते।लोग जरूर मिलते हैं जिनके दिल में भगवान का वास होता है। आस्था स्थल तो लोगों के मिलने का एक बहाना भर है जहां सारे लोग अपने अपने दुख दर्द लेकर आते हैं। एक दूसरे के साथ शेयर करते हैं और फिर थोडा हल्का होकर चले जाते हैं।मुझे मालुम है इस पत्थर की मूरत में भगवान नहीं है। एकलव्य को भी मालुम था कि वो मूरत द्रोणाचार्य नहीं है बस एक बेजान पुतला है फिर भी उसने उसमें पूरी निष्ठा रखी और ऐसी तीरंदाजी सीख ली कि कुत्ते का मुंह भर दिया। बात निष्ठा की है। निष्ठा नहीं है तो मां बाप में भी भगवान नहीं है फिर तो हम केवल उनके यौनांनद का प्रतिफल हैं बस। अपने स्वार्थ के लिये पैदा किया है उन्हौने हमें। लेकिन अगर निष्ठा है तो हमें ये भी दिखेगा कि कैसे मां ने खुद गीले में सोकर मुझे सूखे में सुलाया था। ये भी दिखेगा कि जब जब मैं हताश या निराश होकर मरने की सोचने लगा तो पिता की मजबूत बांहों ने मुझे भर लिया जिनमें कैद होकर मैं जी भर कर रोया था और बाबूजी ने बस इतना ही कहा ," चिंता क्यूं करता है तेरा बाप अभी जिंदा है।" बस इसी एक शब्द ने जैसे मुझे नया जीवन दे दिया था तो क्यूं न मैं उनको भगवान मानूं ? तो क्यूं न पत्थर की उस मूरत को भगवान मानूं जिसकी बजह से बस टैक्सी वालों फूल पत्ती प्रसाद बेचने वालों के घर चूल्हा जल रहा है। घोडे टट्टू पर यात्रियों को ढोने वाले मजदूरों के बच्चे पल रहे हैं। जिंदगी की जद्दोजहद से मुक्त होने को वैवाहिक जोडे कुछ वक्त एक दूसरे को समझ कर नया जीवन पा रहे हैं। बुजुर्गों को कुछ वक्त मिल रहा है यह सोचने को कि उन्होने क्या खोया और क्या पाया ? और अब शेष जीवन का लक्ष्य क्या हो ? भगवान और है क्या ? यही तो भगवान है। यदि इस सृष्टि का वाकई कोई रचियता है और हम सब को चला रहा है वह भी यही सब करेगा जो इस मूरत के बहाने हो रहा है।
मित्र लोग कहते हैं कि नास्तिकों जैसी बातें करता है तो फिर सनातन छोड क्यूं नहीं देता ? दोस्त पागल हो गया है तू ! सनातन को भी कोई छोड पाया है भला आज तक ? सनातन का मतलब प्राचीन नहीं होता जो पुराना छोड नया पकड लो। सनातन का मतलब जो सदा से है और हमेशा रहेगा। जिसका न कोई आदि और न कोई अंत। जिसका कोई प्रवर्तक नहीं हुआ। जिसमें बंधन नहीं हैं। सीमायें नहीं हैं। प्रकृति का दूसरा नाम सनातन है। ऊर्जा का दूसरा नाम सनातन है। सनातन तो विशाल सागर है जिसमें न जाने कितनें धारायें आकर मिलती हैं। ईश्वरवादी अनीश्वरवादी, एकेश्वरवाद बहुदेववाद, द्वैत अद्वैत , साकार निराकार सब कुछ तो है इसमें। दुनियां का कौनसा ऐसा पंथ है जिसकी विचारधारा इसमें नहीं है। अगर अन्य से कुछ अलग है तो यह है कि इसमें किसी की आस्था को लात नहीं मारी जाती। किसी के इस्ट को गाली नहीं दी जाती। बसुधैव कुटुम्बकम की बात करते समय यह अपने पंथ की शर्त नहीं रखता।
बस यही कारण है कि मैं सनातन हूं और सत्य का सफर जारी रखता हूं। 
आसाम मेघालय की यात्रा से लौटने के बाद भी मेरी छुट्टियां बाकी थीं। मेघालय में ईसाईयों से मिला था। ये आदिवासी लोग भले ही ईसाई धर्म अपना लिये थे लेकिन अपनी मूल जडों को इन्होने नहीं छोडा है। प्रकृति और जंगल आज भी उनके लिये पूज्य है। अपनी मातृभूमि अपनी मिट्टी अपनी संस्कृति से बढकर कुछ भी नहीं। यह सेमेटिक नहीं सनातन है।सनातन में बहुत सारे पंथ हैं । बहुत सारी पूजा पद्धति है लेकिन प्रकृति मुख्य है जो सबको जोडे रखती है। 
बच्चे अपने ननिहाल गये थे। सोचा उत्तराखंड की चारधाम यात्रा कर आता हूं। आगरा मथुरा हाथरस अलीगढ होता हूआ नरौरा डैम पहुंचा और गंगा मैया में डुबकी लगाकर सारी थकान दूर कर दी। गंगा मैया में पापों का धुलना एक अलंकारिक कहावत है। जब भी व्यक्ति अपने घर से निकल कर नदियों जंगलों और पहाडों की ओर रुख करता है और एकांत में बैठकर मनन करता है कि मेरे जीवन का उद्देश्य क्या है और मैं कर क्या रहा हूं। यही प्रायश्चित उसके पाप धो डालता है। मन को साफ कर डालता है। एकदम तरोताजा होकर घर लौटता है। 
चंदौसी में मित्र रानू गुप्ता जी के घर पर दोपहर का भोजन लिया और विश्राम कर शाम को तीन बजे नैनीताल के लिये निकल लिया। रानू गुप्ताजी का परिवार आर्य समाजी है। एकेश्वरवादी है।मूर्तिपूजा नहीं करता। निराकार ईश्वर की उपासना करता है लेकिन परिवार के कुछ सदस्य बैष्णव भी हैं तो कुछ सदस्य शैव भी है। मूर्तिपूजा करने वाले। विभिन्न विचारधाराओं वाले लोग एक ही परिवार में एक ही थाली में खाना खाते हैं। निरंकारी रानू भाई अपने भाई को काफिर कर दुत्कारता नहीं है और न ही उसके कमरे में घुसकर उसके मंदिर की मूर्तियों को लात मारता है। यही सनातन है। विभिन्न धाराओं का विशाल समुद्र में मिलना ही सनातन है।
चंदौसी से मुरादाबाद और रामपुर होते हुये रुद्रपुर की ओर आगे बढा। भारत विविधताओं का देश है।गंगा घाट पर हिंदुओं की नदी पूजा देखी थी तो चंदौसी में हवन करके प्रकृति का आह्वान आर्यसमाजी । रामपुर में जालीदार टोपी, मिले तो ऊधमसिंह नगर में सनातनी परंपरा में पवित्र गुरू शिष्य परंपरा को अमर बना देने वाले सनातन के सबसे बडे बेटे सिख भी मिले। हाथ में गुरूओं की पुस्तक लेने वाले इन शिष्यों ने उस वक्त कृपाण थाम ली थी जब निराकार ईश्वर के नाम पर कुछ जेहादियों ने देश और सनातन की इज्जत लूटना प्रारंभ कर दिया था।
रामपुर में मिलने वाले मौमिनों और रुद्रपुर में मिलने वाले सिखों की जीवन शैली को भी बडे गौर से आबजर्ब किया था मैंने। दोंनों ही ड्रैस कोड के मामले में समान हैं। एक अलग समुदाय के रूप में पहचान बनाते हैं। ड्रैस देखकर आसानी से लोग पहचान जाते हैं। जालीदार टोपी और पगडी पूरे विश्व में मिलेगी आपको। खानपान भी लगभग समान ही है। धार्मिक मान्यता गुरूओं और पैगंबरों की भी समान है। धार्मिक पुस्तक को भी दोनों ही अपनी जान से ज्यादा सम्मान देते हैं। भाषा के मामले में भी अपनी अलग अलग पहचान रखते हैं। विश्व के किसी कौने में रहें धार्मिक पुस्तक वाली भाषा को प्राथमिकता दी जाती है। दोनों पंथों में बहुत सारी समानतायें होने के बावजूद एक बहुत बडा अतंर है और वह है मानसिक सकारात्मकता एवं नकारात्मकता का। 
रुद्रपुर में गुरुद्वारे में ही रुका था मैं। गुरु के दरवाजे पर चाहे कोई आ जाय खाली हाथ नहीं लौटता। कभी आपका पंथ आपकी जाति आपका फिरका आपका रंग नहीं देखा जायेगा। बस अपनी आईडी की एक कौपी दो और लंगर में खाना खाकर कमरे में आराम करो। गुरूद्वारे में मैं श्रद्धा से मत्था टेकता हूं। मुझसे कभी किसी ने मत्था टेकने को बाध्य नहीं किया। गुरुओं की इतनी पवित्र वाणी के सामने कौन ऐसा होगा जो शीष न झुकायेगा। जिन गुरूओं ने इस देश की बहन बेटियों की इज्जत बचाने को शीष कटा दिये तो उनके आगे शीष स्वत: ही झुक जाता है। गुरुगृंथ साहिब और एक ऊंकार को मानने वाले गुरूओं के इन शिष्यों ( शिक्षों / सिखों/ learned) ने कभी देवी मां का अपमान नहीं किया। आज भी सारा हिंदुस्तान " जय माता दी " का जयघोष करता है जो कि पंजाबियों द्वारा ही दिया गया है। पंजाबी में "क" को "द" बोला जाता है। गुरूनानक तो हज करने मक्का मदीना तक पहुंच गये थे। देश विदेश में रहने वाले सिखी भाई चर्च भी जाते हैं। सभी पंथों का सम्मान करना इन्हें इनके गुरूओं ने सिखाया है और दूसरी ओर कुछ बताने की आवश्यकता नहीं है।
रुद्रपुर से आगे हल्द्वानी नैनीताल अल्मोडा बद्रीनाथ हेमकुंडसाहिब केदारनाथ की यात्रा अभी जारी है।











Friday, July 28, 2017

आसाम मेघालय यात्रा : माजुली ।

हम जहां ठहरे थे वह जगह कमलाबाडी कस्बे से दो किमी अलग हरे भरे धान के खेतों के बीच बनी बंबू कौटेज थीं। दूर दूर तक सिर्फ हरियाली ही हरियाली। कौटेज मालिक बाईक्स भी किराये पर देता है। पांच सौ रूपये में दिनभर के लिये। चूंकि शाम को अतिंम फैरी तीन बजे थीं और हमें उसी से बापस होना था क्यूं कि मेरा आगे का (अरुणाचल का परुषराम कुंड, शिवसागर और तवांग ) प्लान रद्द हो चुका था। रद्द होने का कारण था हमारी मुख्यमंत्री महोदया का आकस्मिक निरीक्षण अभियान और छुट्टियों का रद्द होना। 

satyapalchahar.blogspot.in

माजुली द्वीप एकदम ग्रामीण जीवन है। ऐसी जगह को देखने के लिये तो कम से कम तीन दिन चाहिये। हमारे पास तो पूरा एक दिन भी न था फिर भी बाईक की बजह से बहुत सारे सत्र घूम लिये। घूम क्या लिये बस छू लिये समझो क्यूं कि सत्रों की जीवन शैली को समझने के लिये तो वहां रुककर देखना पडता है। एक बात और है कि ये सत्र एक दूसरे से इतनी दूर हैं कि बिना बाइक के इन तक पहुंचना ही संभव नहीं है। हम सुवह तडके ही निकल पडे। सबसे पहले पहुंचे मिसिगं विलिज जहां मिसिगं जनजाति के लोग आज भी अपनी पारंपरिक जिंदगी जीते हैं। रोड के दोनों ओर बांस की बनी हुई झोंपडी और उनके आगे बांस की ही बाउंड्री वाल। ऐसे तो माजुली में विभिन्न जाति जनजातियों के लोग रहते हैं जिन्होनें माजुली के शानदार सांस्कृतिक विरासत के लिए अमूल्य योगदान दिया है लेकिन सबसे अधिक मिसिंग ही हैं। द्वीप में ४७% जनसंख्या अनुसूचित जनजाति की है जिनमें मिसिंग, देउरी और सोनोवाल-कछारी शामिल हैं। माजुली की आबादी में असमिया के अन्य जाति उपजाति जैसे-कलिता, कोंच, नाथ, अहोम, चुतिया, मटक और ब्राह्मण भी रहते हैं। इन के अलावा, कमोवेश संख्या में चाय जनजाति के लोग, नेपाली, बंगाली, मारवाड़ी और मुसलमान भी वर्षों से यहाँ बसोवास कर रहे हैं। मिसिंग जनजाति को “मिरी” भी पुकारा जाता है। मिसिंग जनजाति सदियों पहले अरुणाचल प्रदेश से यहां आकर बस गए थे। मिसिंग लोग वास्तव में बर्मा(वर्तमान म्यांमार) देश से ताल्लुक रखने वाले मंगोल मूल के लोग हैं। लगभग ७०० साल पहले वे बेहतर जीवन की तलाश में अरुणाचल प्रदेश के रास्ते होते हुए असम आये और ब्रह्मपुत्र नदी के सहायक नदियों जैसे दिहिंग, दिसांग, सुवनशिरी, दिक्रंग के इर्द गिर्द बसने लगे। इसी क्रम में माजुली में भी मिसिंग लोग बहुतायात में बस गए। नदी के किनारे बसने के कारण वे बहुत कुशल नाविक और मछुआरे होते हैं। ऐसा कहा जाता है की हर दूसरा मिसिंग बच्चा बढ़िया तैराक होता है। ये लोग नदी किनारे की ज़िन्दगी के आदी हो गए हैं और नदी को अपना जीवनदाता मानते हैं। नदी की विभीषिका और इससे उपजने वाली विषम परिस्थितियों को ये जीवन का अंग मानते हैं आजीवन इससे संघर्ष करते हैं।माजुली स्थित यह गाँव मिसिंग लोगों के विशिष्ट लोक संगीत, नृत्य और संगीत वाद्ययंत्र होते है। इनमें से अधिकांश का इस्तेमाल उनकी सामाजिक और धार्मिक उत्सवों के दौरान होता हैं। एक परंपरागत मिसिंग घर लठ्ठों (आमतौर पर बांस) के ऊपर बना होता है। ऐसा वे अचानक आने वाली बाढ़ से बचने के लिए करते है। इनके घरों के छत फूस से बने होते हैं और फर्श, दीवारों और छत के लिए बांस बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया जाता है। मिसिंग लोग यूँ तो विभिन्न त्योहारों को मनाते हैं लेकिन उनके दो मुख्य पारंपरिक त्योहार हैं- आली-आय-लिगांग और पोराग। ये त्यौहार उनके कृषि चक्र के साथ जुड़े होते हैं। मिसिंग महिलायें कुशल बुनकर होतीं हैं। वे अपनी किशोरावस्था तक पहुँचने से पहले इस कला में निपुण हो जाती हैं। उन्हें प्राकृतिक रंगों का भी अच्छा ज्ञान होता है। माजुली की मिसिंग महिलाओं को विशेष रूप से उनके उत्तम हथकरघा उत्पाद मिरीजेन शॉल और कंबल के लिए जाना जाता है। 
मिसिंग गांव के बाद हम बढ गये सामुगुरी सत्र की तरफ जहां कि मुखौटा निर्माण होता है। हालांकि यह सत्र छोटा ही है। केवल दो तीन भवन हैं जिनमें विद्यार्थियों को मुखोटा बनाना सिखाया जाता है। 
मुखौटा शिल्प यहाँ कमाई का एक स्रोत है। सत्रों में भावना (नाटक), रास उत्सवों में इस्तेमाल होने वाले मुखौटों की माजुली से बाहर भी आपूर्ति की जाती है। विशेष रूप से सामुगुरी सत्र मुखौटा बनाने के शिल्प में अपनी विशेषज्ञता के लिए प्रसिद्ध है।
सामुगुरी सत्र के बाद बैष्णव दक्षिणपथ सत्र जो दस किमी दूर था लेकिन रास्ता इतना आनंददायक है कि चलते ही रहो बस। दूर दूर धान के खेत और चारागाहों में चरतीं गायें। पानी भरे खेतों को बैलों की सहायता से जोतते किसान। पिता की सहायता करते युवक। बगुलों सारसों और जलपक्षियों को उडाते छोटे छोटे बाल गोपाल। सब कुछ मनमोहक। नहर किनारे दोनों ओर घने पेड और अचानक से रोड उतर जाती है सत्र की तरफ। मुझे लगा ही नहीं कि मैं आसाम में हूं। ऐसा लगा जैसे अपने मथुरा वृंदावन के किसी गुरूकुल आश्रम में आ गया हूं।अधनंगे शरीर पर धोती पहने शिक्षक और शिक्षार्थी । गायों को चराने ले जाते युवक। दोनों हाथ जोडकर जय श्री कृष्णा का अभिवादन। सब कुछ मोह लेने बाला। झोंपडीनुमा विशाल भवन जिसमें श्री कृष्ण का संपूर्ण परिवार विराजमान हैं। हम बाहर से देख पाये। अदंर जाने के लिये धोती कुर्ता की वेशभूषा जरूरी थी। मंदिर के बाहर परिसर में उछलकूद करते खरगोश और हिरन। समय की कमी थी वरना दो चार दिन जरूर काटता ऐसी जगह पर। 
माजुली द्वीप असमिया नव-वैष्णव संस्कृति का केन्द्र रहा है। नव-वैष्णव विचारधारा असमिया संत महापुरुष श्रीमंत शंकरदेव और उनके शिष्य माधवदेव द्वारा पन्द्रहवीं सदी के आसपास शुरू की गयी थी। इन महान संतों द्वारा निर्मित कई सत्र अभी भी अस्तित्व में हैं और असमिया संस्कृति का अंग बने हुए हैं। माजुली प्रवास के दौरान श्रीमंत शंकरदेव यहाँ पश्चिम माजुली के बेलागुरी नामक स्थान में कुछ महीने रूके थे। इसी स्थान पर दो महान संतों, श्रीमंत शंकरदेव और माधवदेव का महामिलन हुआ था। इस ऐतिहासिक भेंट का बहुत महत्व है क्योंकि इसी के बाद बेलागुरी में “मनिकंचन संजोग” सत्र स्थापित हुआ। हालांकि यह सत्र अब अस्तित्व में नहीं है। इस सत्र के बाद माजुली में पैंसठ सत्र और स्थापित किए गए। माजुली में स्थित मूल पैंसठ में से अब केवल बाईस ही अस्तित्व में है। दक्षिणपाट सत्र को वनमाली देव ने स्थापित किया था। वे रासलीला अथवा रास उत्सव के समर्थक थे। रासलीला अब असम के राष्ट्रीय त्योहारों के रूप में मनाया जाता है।सामागुरी सत्र रास उत्सव, भावना(धार्मिक नाट्य) और अन्य सांस्कृतिक कार्यक्रमों के लिए मुखौटा बनाने के लिए भारत भर में प्रसिद्ध है।
गरमूढ़ सत्र लक्ष्मीकांत देव द्वारा स्थापित किया गया था। शरद ऋतु के अंत के दौरान, पारंपरिक रासलीला समारोह धूमधाम से मनाया जाता है। प्राचीन हथियार जिन्हें “बरतोप” या तोप कहा जाता है यहाँ संरक्षित किये गए हैं।
औनीअति सत्र निरंजन पाठक देव द्वारा स्थापित किया गया “पालनाम और अप्सरा नृत्य के लिए प्रसिद्ध है। यह सत्र प्राचीन असमी कलाकृतियों, बर्तनों, आभूषण और हस्तशिल्प के अपने व्यापक संकलन के लिए भी प्रसिद्ध है। इस सत्र के दुनिया भर में एक सौ पच्चीस शिष्य और सात लाख से अधिक अनुयायी हैं। कमलाबारी सत्र: बादुला पद्म आता द्वारा स्थापित किया गया यह सत्र, माजुली द्वीप में कला, सांस्कृति, साहित्य और शास्त्रीय अध्ययन का एक केंद्र है। इसकी शाखा उत्तर कमलाबारी सत्र पूरे देश में और विदेशों में सत्रीय नृत्य और सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत कर चुके हैं।
बेंगेनाआती सत्र: मुरारी देव जो कि श्रीमंत शंकरदेव की सौतेली माँ के पोते थे, सत्र के संस्थापक थे। यह सांस्कृतिक महत्व और कला का प्रदर्शन करने के लिए एक नामचीन सत्र था। यहाँ अहोम राजा स्वर्गदेव गदाधर सिंघा का शुद्ध सोने का बना शाही पोशाक रखा गया है। इसके अलावा यहाँ स्वर्णनिर्मित एक शाही छाता भी संरक्षित है।ये सत्र “बरगीत”, ‘’मटियाखारा’’, सत्रीय नृत्य जैसे- झुमोरा नृत्य, छली नृत्य, नटुआ नृत्य, नंदे भृंगी, सूत्रधार, ओझापल्ली, अप्सरा नृत्य, सत्रीय कृष्णा नृत्य, दशावतार नृत्य आदि के संरक्षक स्थल हैं। ये सभी श्रीमंत शंकरदेव द्वारा प्रख्यापित किये गए थे।
पूरे शहर का चक्कर लगाते हुये हम कमलाबाडी बीच चौराहे पर आ गये। जहां हमने दोपहर का भोजन लिया। मिट्टी के चूल्हे पर बनी हाथ की रोटी और एकदम साधा उडद की दाल। एकदम घर जैसा भोजन। मिर्च मसालों से तो परहेज रहता है मुझे इसलिये ये भोजन भी दिल को भा गया। उसके बाद बढ चले अपने कौटेज की तरफ जहां से हमें अपना सामान समेटना था क्यूंकि हर हालत में ये अतिंम फैरी हमें पकडनी थी। कौटेज से ही हमें टैक्सी मिल गयी जिसने हमें नदी के तट पर छोड दिया। 
नाव चलने में अभी देरी थी। अन्य सवारियों के साथ साथ दो दूल्हे और उनकी बारात भी थीं। नाव किनारे पर लगी। नाव पर चढने से पहले दोनों दूल्हों को बिठाकर कुछ विदा जैसी रस्म अदा की गयी और भेंट इत्यादि आदि भी दी गयी। उसके बाद शुरू हुआ नाचने गाने का दौर। समझ तो न आया कि क्या गा रहे हैं लेकिन नाचते गाते महिलाओं पुरूषों को देखकर आनंद बहुत आया।
थोडी ही देर में हमारी फैरी चल पडी और हम बाहर आकर माजुली को अलविदा कहने लगे। वहीं पर हमारी मुलाकात हुई राज्यसभा के एक टीवी रिपोर्टर से जो ब्रम्हपुत्र के बढते अपरदन की रिपोर्ट कवर करने आया था। चलते समय हमने देखा कि जगह जगह पर नावें रखी हुई हैं। कुछ नावें तो ऐसी लगी जैसे पानी उतरने के बाद वहीं जमी रह गयी थीं। हालाकिं नाव निर्माण माजुली का काफी बडा रोजगार का साधन है। जलीय इलाका एवं बाढ़ के खतरे के कारण नाव एक उपयोगी साधन है, इसीलिए नाव बनाने की कला यहाँ का एक पारंपरिक व्यवसाय है। यहाँ के नाव बनाने में माहिर लोगों की मांग हमेशा बनी रहती है। हस्तशिल्प और हथकरघा उद्योग भी यहां काफी उन्नत है। यहाँ बांस और गन्ने से फर्नीचर आदि बनाये जाते हैं। हथकरघा गांवों की औरतों के बीच एक प्रमुख व्यवसाय है। माजुली की महिलायें कुशल बुनकर होती हैं और अपने कपड़े स्वयं बुनती हैं। मिसिंग महिलाओं को कपड़ों के विदेशी डिजाइन और मनभावन रंग संयोजन के लिए जाना जाता है। वे "मिरजिम" नामक विश्व प्रसिद्ध कपड़े बनाती हैं। यहाँ लगभग २० गाँव कच्चे रेशम के एक किस्म “एंडी” का उत्पादन करते है और उसके उत्पाद तैयार करते हैं। 
हालांकि हमने रोटी भी खायी और चावल भी लेकिन यहां का मुख्य भोजन चावल ही है। यहाँ चावल का एक सौ अलग अलग किस्में किसी भी प्रकार के कृत्रिम खाद या कीटनाशक के इस्तेमाल के बिना उगाई जाती हैं। “कुमल शाऊल” (हिंदी: कोमल चावल) यहाँ चावल के सबसे लोकप्रिय किस्मों में से एक है। इसे सिर्फ पंद्रह मिनट के लिए गर्म पानी में डुबो कर रखने के बाद खाया जा सकता है। आमतौर पर इसे नाश्ते के रूप में खाया जाता है। बाओ धान, चावल का एक अनूठा किस्म होता है जो कि पानी के नीचे होती है, और दस महीने और बाद काटा जाता है। बोरा शाऊल एक अन्य किस्म का चावल है जो चिपचिपा भूरे रंग का होता है। यह चावल असम के पारंपरिक खाद्य पीठा बनाने और अन्य आनुष्ठानिक कार्यों में प्रयुक्त होता है।
इस बार हमारे पास पूरे एक महीने की छुट्टी थी और हम दोनों पति पत्नि सोच कर आये थे कि सभी सात बहन राज्यों को घूमकर आयेंगे लेकिन नौकरी तो नौकरी है। सरकार के आदेश के गुलाम हैं हम। यात्रा अधूरी ही रह गयी। अगली बार फिर होगी इसी आशा के साथ आसाम मेघालय यात्रा विवरण को यहां विराम देता हूं।